बरगद के पेड़को इंसान की फिक्र उसकी के जुबानी एक नसीहत ...

 बरगद के पेड़को इंसान की फिक्र उसकी के जुबानी एक नसीहत ...

     सुबह फजर की नमाज के बाद बढती उम्र की शिकायतों समझते हुए.सेहत की तंदरुस्ती का खयाल करते हुए ,दूर दराज  तक पैदल घूमने का शेड्यूल कायम किया है.उस मुताबिक मैं  जब घूमने निकलता हूँ .पिछले कई दिनोसे रास्ते एक बडासा बरगद का पेड़ लगता है.बरगद का  पेड़ मानो जैसे चुनौती देेेकर मानो जैसे कहता था ,

"है हिम्मत तो मेरी टहनियों सेे लटकेे झूला लेकर तो दिखा."

मैने अपनी उमर और कूवत को जानकार ख़ामोशी इख़तियार कर ली थी.चुनौती को अस्वीकार करना,जो मेरे अपने मिजाज़ के खिलाफ था. पिछले कई दिनोसे मै बरगद के पेड़ से दोस्ताना अंदाज में प्रेमभाव से बच्चोसा अपने दादा दादी,नाना नानी के पीठपर पोता पोती नाती की तरह लाडलीसी हरकत करते हुए हल्का हल्का लटकने की कुछ कोशिशे करनी चाही. तो अपनी जिस्म की औकात समझने लगी. जिस्म के अलग अलग पुरजे (पार्ट)बदनमें टहनियोंको लटकने से खिंचाव वजहसे अलग अलग हिस्सों से दर्द की बोली बोल रहे थे.बड़ो के बोल सुने थे,कहते है ना!समझदार को इशारा काफी. मैंने अब दिल में ठान ही लिया था.बरगद का पेड कितनीही चुनौती क्यों न दे,उसे नजर अंदाज कर रास्तेसे सीधा चल गुजरूँगा, मगर इंसान की फितरत में होता है ना,जब भी पेड के करीब करीब मैं आने लगता तो चुनौतियों कानोमे गूँजने लगती और अपने आप दिलमे उछलकूद करने के लिए बदन मानो हाल मारना सुरु हो जाते. दिल को रुझाने की समझने की मैं बार बार कोशिशे करता रहता.मेरे लिए ये सब बडा मुष्किलसा बन था. 

     वो बचपन हमने बरगदके पेड पर खेल कूद गुजारा था. वो यादे सताने लगती.बरगद के पेड़ से उन लटकती हुई डाली को लटककर हम बच्चों का  जोर से झूला झूलते झूलते  कब पेड़ पर चढ़ जाते और सुरपारंबी दोस्तों के साथ खेलना सुरु कर देते पता ही नही चलता.खेलते वक्त कई बार पेड पर लटकते हुए डाली से जोर से झूला ले हवा के झोंकोसे ऊपर चढ जाते थे और उसी तरह जमीनपर आजाते थे.  थकना मानो हमारे फितरत में था नही. मगर आज डालीसे झुलाना तो दूर लटकना  मेरे बस में ही नहीं है.इसे बात को दिलने आसानीसे कबूल कर लिया था.

  आज मेरे कदम बरगद के पेड के पास कुछ देर केलिए ठहरही  गये. उसने आज मुझपर क्या मोहनी कर डाली प्यार भरी उसकी की नज़र का असर लग रहा था.मुझसे वो धीरे धीरे से कहता हुआ साफ सुनाई दे रहा था, "बेटा तुझ जैसे बहोत सारोंका का बचपन मेरे गोद मे खांदो पर हंसते खेलते मेरे लटकती हुई फांदी को लकते गुजरा है. तू हर रोज जब मेरे पाससे  गुजरता है,मैं तेरी आँखोंमे मुझे देख तुझे तेरा बचपन तू जो याद करता है उसे मैं रोज पढाता हुँ और उसी तरह मुझे भी तो तुम जैसे बहोत सारे बच्चों की याद बहोत सताती है. समझता है तू ? मै तुझको चुनौती क्यों दे रहा था? पिछले कई सालों से कोई भी बच्चा मेरे गोदमें खांदो पर खेलाही नहीं.वैसे तो राहगीर बहोतसे इस रास्तेसे आते और जाते है. उनकी सूरत से ऐसा लगता है,किसीके पास कोई फुरसत ही नहीं है. बस भागे भागे से जिंदगी जी से रह है. अपने बारे में सोचने की फुरसत नही है शायद उनके पास"

 कुछ देर तक बरगद का पेड चुप हो गया और फिर मुझसे बोल पडा,"तू जानता है,मैं तुझे चुनौती रोज क्यों दिया करता हूँ?"

मैने बच्चोंसी गर्दन हिलाकर कहा, "नहीं."

बरगदका पेड़ कहने लगा, " सुन, तू जो रोज यहाँ से गुजरता है, तो मेरे डाली को छूकर जाता ही है. मैं उस वक्त तेरे नजरो झाँकती और पढता हुँ, तो साफ साफ दिखाई पडता है के ,तू बचपन की तरह डाली को लटककर झुलाना चाहता है.लेकिन डरता है अपने आप से कही हाथ छूट गिर ना पड़े.सच फरमा रहा हूँ  ना बच्चा ! "

मैं उसकी बातोमे मानो डूब से जा रहा थाऔर  मुझसे हल्की सी प्यार भरी आवाज में आगे बोल पड़ा,"चल झूल ले झूला आज.....मै हूँ ना बच्चे ! तू मेरा बच्चा ही है ना. मेरे दिल के अरमान  कर दे पूरे. ऐ अफजल!सोंचता क्या है  चल झूला झूलले,....झूलले."

अब मैंने भी तो आव देखी ना ताव देखी,एक जोर जो लगाया .पल में ईधरसे उधर उधरसे इधर देखते देखते कई बार झूला झुल गया.खुशियों से फुले मैं भी फुला समाया न था और   न बरगद का पेड़ समाया था.जब मै कुछ देर बाद निकलने लगा,तो नसीहत वाली बात कही.

"तुम्हारे बच्चे आजकल बड़े कमजोरसे लगते है. कभी कभी हमारे पास कांदो पर खेलने लाया करो.ट्यूशन,घर और मोबाइल से बाहर निकालकर मैदान में ले जाया करो.शहरोंमें मैदान अब घर सामने आंगन नही बचे है,कॉलनी के ओपन स्पेस पर अतिक्रमण, मैदान बस्तीयों से बहोत दूर निकल गए है.अब बच्चो के ही नही बडोके सेहत (आरोग्य) का बिघाड़ में बढ़ोतरी हो रही है. हमारा रिश्तेदारों का बसेरा भी इन्सानोने उजाड़ दिए हैं. मैं शहर से दूर तो हुँ,देख अब सामने इंसानने यहाँ भी अपार्टमेंट बनाने सुरु कर दिये. डर सा है मुझे उजडनेका मगर हमारी फितरत है जो लोगोको साया और सेहत देने की बिना किसी अपेक्षा मतलब बिना किसी जातपात देखे.कई पंछियों का बसेरा  बन जाते है हम.देख आज भी तेरे मजबूर कांधे का राज मेरा एक हमारी बिरादरी का बरगद का ही पेड़ ही है ना?"

मै सोंच में पड़ गया था.वो बरगद का पेड मुझे नसीहत नही दे रहा था बल्कि मुझे जगा रहा था.हैम सबको नसीहत दे रहा था कह रहा था,"सुदृढ़ रहेंगे बच्चे,तो सशक्त बनेगा भारत! " 

दो साल बाद मैं आज उस राह से गुजरा ,तो  नया जिलाधिकारी कार्यालय निर्माण हो कर कार्यालयोंकी  चहल पहल सुरु हो गयी थी. रास्ते पर कट पड़े बरगदके पेड़ के अंग है.जो भी बचा शेष पेड है लटकती हुई टहनियां नजर नही आती.उसकी छाया मे कार्यालयीन काम के लिए आये लोगो की गाडीया लगती है और कभी कभी आंदोलनकारी  उसकी छाया में बैठे नजर आते है.कुछ भीड है,मगर झूलने के लिए बच्चे नही है.आज वो सिर्फ खामोश है.खामोशी इसलिएअब वो जान चुका था.कोई बच्चा तो नही आनेवाला मेरी टहनियों से झुलाने वाला एक तू था पर देख टहनियां नही है.वो अपनी आँखों से कह रहा था,अब वो खामोश था.आज मैं उसको पढ रहा था महसूस कर रहा था.आँख मेरी भरी हुई थी,उसकी खामोशी को देख कर आज मैं अपने आँसू रोक नही पाया. 

मेरे आँसू देख वो मुस्कुराता मुझसे कहने लगा."अरे  आँसू पोछ ले पगले,देखी मेरी हालत, मुझसे  बच्चे  झूल नही पाएंगे,खुशी इस बात पर है कि,जब तक मैं खड़ा हूँ कुछ लोग मेरे सायेमें बैठे है और तू जब भी यहाँसे गुजरेगा और कई लोग मेरे सायेमें बैठे नजर आएंगे.कुछ मिला या कुछ खोया इसका गम ना करना जिंदगी में जैसा समय आया लोगो को काम आये बस यही नियत रखना.देखा तूने मेरे दो रंग,मैं तब भी और आजभी लोगोके काम आ रहा हूँ.बस तू इतना ही जान ले बच्चा..."

 अफज़ल सय्यद,( संपादक, ZERO NEWS)


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