अपने लोगो मे समझदारी नही है! ये ना कहे तो बेहतर...

     एक बहोत बड़ी बीमारी का शिकार सज्जन सभी जाती धर्म के लोगो मे अक्सर पायी जाती है.कभी कभी मुझको ही मुझमे समझदारी न होने का अहसास होने लगता है. इस बात पर मेरे अजीज दोस्त की इत्तेफाके राय एक हो सकती है.आजकल वैसे सभी के बीवी की अपने शौहर के समझदार है या नही के बारे में वोटिंग करवाई जाए तो, शौहर समझ ना होने के हक में ही ज्यादा वोटिंग पाई जाएंगी. जब कोई कहता है अपने लोगोमे समझदारी नही तो......
     बाद नमाजे मगरिब के मेरे खाना खाने की आदत से मेरे सारे दोस्त अहबाब अच्छी तरह वाकिफ है.अपनी मशहूर आदतों के हिसाब से खाने के बाद घर चहल कदमी करते हुए चौराहे पर कुछ देर के लिए रुक गया था और शाम के बाद चौराहे की चहल पहल को खामोशी से देख रहा था.रास्ते के उस पर एक कार रुकी और कार की कांच नीचे कर मेरे करीबी  दोस्त बिरादर भी कह सकते है, जिसने भैया,कहकर आवाज लगाई,मैन कार की तरफ देखा और चल पड़ा.मुझे कार मैं बैठने बिरादर कहा,और हम दोनो निकल पड़े.बिरादर ने गाड़ी चलाते हुए पूछा,"रास्ते मे एक शॉप की ओपनिंग है वहाँ पांच मिनट रुकते है,फिर आगे सामाजिक प्रोग्राम है.आप चलोगे क्या?" मैंने कोई ऐतराज नही जतलाया,मुझे भी उसी प्रोग्राम में जाने का इरादा पहले से था.लेकिन अकेले जाने को मन नही कर रहा था.अब तो मौका भी चलकर घरतक आया तो,मैं कैसे इनकार करता भला.
     रास्ते मे शॉप ओपेनिंग को कुछ देर रुककर,हम सामाजिक प्रोग्राम के लिए निकले.हमारे पोहचने तक शायद लगभग आधे से ज्यादा खत्म हो गया था.जिसके साथ मैं आया बिरादर हॉल तरफ निकल गये. कुछ दोस्त बिरादर जो हमारेसे पहले आये हुए थेऔर जो सबसे पीछे हॉल के बाहर रुके हुए थे.और जिन्होंने आगे कोई जगह नही है यह इंफॉर्मेशन भी हमे दी.मैं बाहर रुके हुए दोस्त बिरादर के साथ ही रुक गया.वक्ता की बात भी बाहर तक अच्छी तरह सुनाई दे रही थी.वैसे भी मैंने अपना वसूल ही बनाया है.कोई भी सभा हो,शादी हो किसीभी तरह का सामाजिक,धार्मिक प्रोग्राम हो सबसे आखरी में कुर्सी हो बैठक आखरी लाइन में ही बैठता हूँ,क्योकि मैं अपनी आदत से वाकिफ हूँ. कुछ बात अच्छी न लगे तो झट से नाराजगी के सुर निकलते है. जिससे मजमा डिस्टर्ब हो जाता है.इसे आप मेरी समझदारी कह सकते है.
     पीछे से मजमे के मूड को समझना भी आसान होता है.साथ ही बिना किसीको डिस्टर्ब किये भागना भी समझदारी ही होती है.मजमे में कई महाभाग ऐसे भी पाए जाते है,आगे की सफे (लाइन)में बैठने जाते तो है,पर प्रोग्राम रंग में होता तब ही उठकर सबके रंग को भंग करते है.अलग अलग इंसान की अलग अलग फ़ितरते तो होती है ना.हम सब इसे समझकर ही लेते है.
     हम दोस्तों हॉल के बाहर और आखिर में खड़े रहने की वजह से बीच बीच मे कुछ बाते हो रही थी.एक बिरादर ने दूसरे बिरादर से शिकायत भरे अंदाज में कहा,"अपने शहरके लोगोमे समझदारी है ही नही." शायद दोनो बिरादर मानो इत्तेफाके राय रखते हुए आगे की गुफ्तगू(बातचीत) कायम करना चाहते थे.मैं कह पड़ा."सब इंसान की फितरत एक सी होती है.सिर्फ हमारे शहर के बारे मे गलत राय कायम नही की जा सकती.एक बिरादर जो मेरी आदतसे वाकिफ था.मुझे देखकर मुस्कुराया.
     मेरी सोंच ये कहती है,शायद आप भी इत्तेफाक रखेंगे.जहाँ एक माँ बाप की औलाद चार चार भाई में समझदारी नही पायी जाती है.हम सब की आदत है,हमारी बात सब सुने पर हम किसीकी ना सुने या हम किसीके किए कुछ करे तो हमेशा हमारे एहसान में रहकर हमारी सही गलत सी बात में हा में हा मिलाये.या ऐसा भी होता है, किसीके लिए मुसीबत में तुम हर तरह की मदत करते हो,मुसीबत टलते ही आपके साथ बदसलूकी कर देंगा.
      आज तुम पर हालात है इसलिए समाज इकट्ठा हो रहा है.आप भी भीड़ की लीड करते हो अच्छी बात है.,चलो आपकी बात को सुन कोई तो साथ आता है.इसमे कोई एक आदत सा थोड़ी होता है.कुछ खराब या मतलबी होंगे ही ना. वैसे दो चार गुट भी तो हो ही जायेंगे.तो काम करने वालों को फर्क नही पड़ना चाहिए.हम उन की वजह से सारे शहर के समाजको जिम्मेदार ठहराकर अपने शहरके लोगोमे समझदारी नही है ये किसीके इल्जाम लगाना कहाँ तक सही है.
      अक्सर अच्छे में शुमार लोग को समाज को भलाबुरा कहते ही सुनता हूँ, तो बहोत अफसोस होंता ही है.जो साथ आये उसे साथ लेकर चले,जो ना आये उसके बिना चलो.या भले एकेला चलना पड़े तो अकेला चलना भी बेहत्तर हो सकता है कुछ अंजाम तो निकलेगा जरूर....

अफज़ल सय्यद, अहमदनगर, महाराष्ट्र.

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