कैसे चल रही है जिंदगी आज कल...ग
कैसे चल रही है जिंदगी आज कल...
हमारी बिल्ली मीनू को तीन बच्चे हुए है.बच्चे अब घर मे इधर उधर घुमने लगे है.जहाँ कही आँख बंद हो वही एक मिलकर सो जाते है.आज लग भग शाम ६ या ६.३० के वक्त बाथरूम के पास पैर साफ करने के मॅट पर गहरी नींद में सोये हुए थे.अपनी भी जिंदगीका हाल भी तो पिछले हफ्ते से वैसा ही चल रहा है.रात और दिनमें जब जब आंख लगी सो दिए और आंख खुली मोबाइल हाथ मे लिए सोशल मीडिया टटोलने बैठ गए.कभी टिवी न्यूज देखते देखते देखते कॉमेडी सीरयल देखते देखते सो लिए तो ब्रेकिंग न्यूजकी आवाज से बीच मे ही जाग गये.आखरी मुगल बहादुर शाह जफर का शेर सी जिंदगी "उम्र दराज मांगकर लाये थे चार दिन,दो आरजू में कट गये, दो इंतजार में."बस इतना ही अशार कहता हूँ,आगे मुकम्मल नही करूँगा.मेरी सुबह कैसे होती है और रात कैसे खतम हो रही है.कुछ पता ही नही चल रहा,बिस्तर भी बोझ और तकिया और लोड की कमर ढीली पड गयी है. जब लोड को हाथ मे उठाया तब हालात ए लोड का माजरा समझ मे आया.ईन्ही हालात में हफ्ता गुजर गया.अब साला जिस्म भी अपना घर की कैद और आरामसे पनाह मांगने लगा है.भाईसाहब ये हाल मेरा और आपका नही बल्कि, लगभग सभी मर्द (पुरूष) देशवासियों का है.
महिलाये छोड़कर, क्योंकि नौकरियां करनेवाली महिलाये काम की छुट्टी होने के बावजूद घर के खाने पकाने, धोने बर्तन,साफ सफाई, चुनना गुनना, पानी भरने जैसे काम करने ही पड़ते है.यह सच्चाई मुझे अपनी बीवी के जुबानी मालूम हुई है.हकीकत तो यह भी तो है,नौकरिया करनेवाली महिलाओंको तो कई सालोंसे दिन रात कैसे गुजरते है,इसका पता ही नही है.हम मर्द को इसका एहसास की कहा होता है.चाय का कप,खाने की प्लेट,पानी का गिलास सब चाहिए होता वक्तपर और जगह पर हकीकत तो यही है.
तो कैसे चल रही है जिंदगी आज कल ?
जवाब है," बिल्ली के बच्चे की तरह.पूरे घर भरमे मुक्त संचार,क्योंके घर के बाहर सरकार ने लगाई है संचारबंदी."वैसे मैंने लिखने से पहले तय किया है,मैं करोना महामारी का जिक्र(उल्लेख) कम ही करू और हम सब अपने ही घरमें कैद है, करोना(कोविड 19) महामारी वजह है.
कभी सो कर,कभी खबरे,कभी सोशल मीडिया पर रात दिन का वक्त सभी का जैसे तैसे गुजर रहा है. दिन निकले या रात हो कोई फर्क नही,14 एप्रिल 2020 को सरकार के फैसले का है इंतजार, हफ्ते की एक छुटी का रहता था हम को इन्तेजार,अब आलम ये है,रात में ऐलान करे सरकार,सुबह से खुलेंगे सरकारी ऑफिस और बाजार न करे सुबह का इंतजार. अल्लाह का शुक्र है, मैं अपने गाँव मे,आपने रिस्तेदारोमे और घरमे हूँ.दो वक्त की रोटी मिल रही है.कई लोगो का हाल के पैसा नही है पास,बालबच्चों को होने लगा है उपवास. गाँव भी पास नही,रास्ते पर संचार नही ,तो रोजगार नही.जो कुछ पास था अब खत्म हो चुका है.अब इनकम का जरिया कहा बचा है.रास्ते पर चलो तो पुलिस डंडे मारती है.मिनिस्टर फाइबर के दंडे को तेल लगाकर भूखे गरीबोको मारने की बात कर रहे है.कोई सैनिको को बुलाने की बात कर रहे.रास्ते सारे बंद कर दिए है.बीमारीमे गरीब कहाँ मर रहे है ? गरीब तो बेरोजगारिसे झुंज रहे है.वक्त बडा है बाका.हम सब को एक दूसरे को है संभालना और देश को भी है संभालना.या रब तूही निकाल इन मुसीबतों का हल.सब्र कर ऐ इंसान ठहरा है वक्त जो जाएगा टल.चाहे अच्छी हो या बुरी चल रही है अपनी जिंदगी आजकल..….
जयहिंद,
अफजल सय्यद, अहमदनगर, महाराष्ट्र



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