तुम भी लिखा करो...
तुम भी लिखा करो...
शायद मै जो कुछ सामाजिक मज़ामीन (आर्टिकल)लिखता हूँ, कुछ लोग पढ़ते है,कुछ लोग उसे पसंद भी करते है.दो रोज पहले एक फोन आया था.भाई आपका कोई नया आर्टिकल नही आया? फोन से अर्जी की गयी. मैंने खामोशी से फोन से फोन करनेवाले की बात को सुन लिया.फिर हल्की सी आवाज में कहा,"कुछ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ लेकिन कुछ बात जम नही रही" सामाजिक आर्टिकल भी बड़े अजीब होते है आजकल हर रोज नई नई कई विषय एक दूसरे जुड़े नजर आते है.जिस कारण दिमाग मे ट्राफिक जाम हो जाता है.
जैसे असम की NRC ने संसद में CAA जन्म लेकर भारतभर भुजाल मचाती हुई,शाहीनबाग में मुस्लिम महिलाओं को CAA, NRC,NPR के विरोध के लिए प्रेरणा बन गई ,दिल्ली विधानसभा के चुनावमे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करवाने के लिए एक विषय बन गयी.विरोध में खड़े रहनेवाले गद्दार और समर्थन में खड़े रहनेवाले भक्त लोकशाही (जमुरियत)में अजीब परिभाषा बनकर सामने आयी.गोदी मीडियाने भी खबरे खूब चलाई.आतंकवादी,देशके गद्दारो के जैसे कई इल्जामात की खैरात बाटी गयी.सुना है हनुमानजी का आशीर्वाद चुनाव जीतनेवाले के हक पायी गयी.
अमित शहा की सायलेंट सुनाई पड़ी,"नफरत के बयानबाजीसे हमे नुकसान हुआ है" साथ शाहीनबाग मे जोरके करंट की बात अब शाहीनबाग से चर्चा की बाते कैसे अमित शहा के जुबांसे निकली? बहोत सारे विद्वानोंने बहोत सारी बाते यूट्यूब के माध्यम से सुनाई और कहियोंने अपने विचार कही कोट करवाये कही विस्तारसे वर्णित किया.इलेक्ट्रॉनिक न्यूज मीडिया ने कई बुद्धिद्धिजीवी की औकात निकाली और बुद्धू एंकरों ने बुद्धू के भाषण को बढावा दिलाया.
ऐसे में कुछ लिखने के लिए जब भी मैं लिखने लेता तो विषयोंको लेकर दिमागका ट्रैफिक जाम हो जाता.बहोत सारे विषय सोंचमें आते ही बासी खबरों की तरह बन जाते.और कई दिग्धा हालात पैदा कर देते.किसीभी विषय को लिखने के लिए लिखने वालोका अपना अभ्यास और अपनी पढने वाले को प्रभावित करनेवाली सोंच का भी होना जरूरी होता है.लेकिन कभी लोगोकी हीनता को देखकर भी कलम लिखना चाहते हुए भी जब धीमी हो जाती है, तो बुद्धि खुद ब खुद नकारा (अकार्यक्षम) बन बैठती है.
हम भारतीय मुसलमानो की खासतौर पे बात करे अक्सर लोगोको उर्दु समझता लेकिन पढ़ते नही आता,अंग्रेजी समझमे आती नही,मकामी भाषा पढने तो आती है लेकिन लिखते आती नही.जो पढ़े लिखे कहलाते है, वो तो पढ़े के पढ़े रह जाते है.आज खासतौर पर हालाते हाजरा (वर्तमान हालात)में समाज को सही रहबरी ,रास्ता दिखाने के लिये लिखने वालो की कमी है. जो आसानी से बात और हालात को समझ सके.कहते है," दस बका एक लिखा !"
लिखी हुयी बात दूरतक जाती है और सदियों तक पायी और समझी जाती है. आज कई गलत बाते छपती है.हम जवाब दे नही पाते क्यों कि मुझे अच्छी तरह याद है.कुछ साल पहले शाहिद अब्दुल हमीद के बारे में निबंध याने एसे लिखने के स्कूलोमे कॉम्पिटिशन ली थी,कॉम्पिटिशन के लिए नंबर निकालने थे.तो मेरे सामने सवाल था, बदतर में बेहतर कौन?गर हालातको समझा जाये और संजीदगी के साथ सोंचा जाये ,तो मेरी सबसे गुजारिश है कि तुम सब भी लिखा करो.जिस जिसको साहिबे समझ और सोंच है,वो समाज के जरूर जरूर लिखे.
अफज़ल सय्यद,अहमदनगर,महाराष्ट्र
शायद मै जो कुछ सामाजिक मज़ामीन (आर्टिकल)लिखता हूँ, कुछ लोग पढ़ते है,कुछ लोग उसे पसंद भी करते है.दो रोज पहले एक फोन आया था.भाई आपका कोई नया आर्टिकल नही आया? फोन से अर्जी की गयी. मैंने खामोशी से फोन से फोन करनेवाले की बात को सुन लिया.फिर हल्की सी आवाज में कहा,"कुछ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ लेकिन कुछ बात जम नही रही" सामाजिक आर्टिकल भी बड़े अजीब होते है आजकल हर रोज नई नई कई विषय एक दूसरे जुड़े नजर आते है.जिस कारण दिमाग मे ट्राफिक जाम हो जाता है.
जैसे असम की NRC ने संसद में CAA जन्म लेकर भारतभर भुजाल मचाती हुई,शाहीनबाग में मुस्लिम महिलाओं को CAA, NRC,NPR के विरोध के लिए प्रेरणा बन गई ,दिल्ली विधानसभा के चुनावमे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करवाने के लिए एक विषय बन गयी.विरोध में खड़े रहनेवाले गद्दार और समर्थन में खड़े रहनेवाले भक्त लोकशाही (जमुरियत)में अजीब परिभाषा बनकर सामने आयी.गोदी मीडियाने भी खबरे खूब चलाई.आतंकवादी,देशके गद्दारो के जैसे कई इल्जामात की खैरात बाटी गयी.सुना है हनुमानजी का आशीर्वाद चुनाव जीतनेवाले के हक पायी गयी.
अमित शहा की सायलेंट सुनाई पड़ी,"नफरत के बयानबाजीसे हमे नुकसान हुआ है" साथ शाहीनबाग मे जोरके करंट की बात अब शाहीनबाग से चर्चा की बाते कैसे अमित शहा के जुबांसे निकली? बहोत सारे विद्वानोंने बहोत सारी बाते यूट्यूब के माध्यम से सुनाई और कहियोंने अपने विचार कही कोट करवाये कही विस्तारसे वर्णित किया.इलेक्ट्रॉनिक न्यूज मीडिया ने कई बुद्धिद्धिजीवी की औकात निकाली और बुद्धू एंकरों ने बुद्धू के भाषण को बढावा दिलाया.
ऐसे में कुछ लिखने के लिए जब भी मैं लिखने लेता तो विषयोंको लेकर दिमागका ट्रैफिक जाम हो जाता.बहोत सारे विषय सोंचमें आते ही बासी खबरों की तरह बन जाते.और कई दिग्धा हालात पैदा कर देते.किसीभी विषय को लिखने के लिए लिखने वालोका अपना अभ्यास और अपनी पढने वाले को प्रभावित करनेवाली सोंच का भी होना जरूरी होता है.लेकिन कभी लोगोकी हीनता को देखकर भी कलम लिखना चाहते हुए भी जब धीमी हो जाती है, तो बुद्धि खुद ब खुद नकारा (अकार्यक्षम) बन बैठती है.
हम भारतीय मुसलमानो की खासतौर पे बात करे अक्सर लोगोको उर्दु समझता लेकिन पढ़ते नही आता,अंग्रेजी समझमे आती नही,मकामी भाषा पढने तो आती है लेकिन लिखते आती नही.जो पढ़े लिखे कहलाते है, वो तो पढ़े के पढ़े रह जाते है.आज खासतौर पर हालाते हाजरा (वर्तमान हालात)में समाज को सही रहबरी ,रास्ता दिखाने के लिये लिखने वालो की कमी है. जो आसानी से बात और हालात को समझ सके.कहते है," दस बका एक लिखा !"
लिखी हुयी बात दूरतक जाती है और सदियों तक पायी और समझी जाती है. आज कई गलत बाते छपती है.हम जवाब दे नही पाते क्यों कि मुझे अच्छी तरह याद है.कुछ साल पहले शाहिद अब्दुल हमीद के बारे में निबंध याने एसे लिखने के स्कूलोमे कॉम्पिटिशन ली थी,कॉम्पिटिशन के लिए नंबर निकालने थे.तो मेरे सामने सवाल था, बदतर में बेहतर कौन?गर हालातको समझा जाये और संजीदगी के साथ सोंचा जाये ,तो मेरी सबसे गुजारिश है कि तुम सब भी लिखा करो.जिस जिसको साहिबे समझ और सोंच है,वो समाज के जरूर जरूर लिखे.
अफज़ल सय्यद,अहमदनगर,महाराष्ट्र
शायद मै जो कुछ सामाजिक मज़ामीन (आर्टिकल)लिखता हूँ, कुछ लोग पढ़ते है,कुछ लोग उसे पसंद भी करते है.दो रोज पहले एक फोन आया था.भाई आपका कोई नया आर्टिकल नही आया? फोन से अर्जी की गयी. मैंने खामोशी से फोन से फोन करनेवाले की बात को सुन लिया.फिर हल्की सी आवाज में कहा,"कुछ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ लेकिन कुछ बात जम नही रही" सामाजिक आर्टिकल भी बड़े अजीब होते है आजकल हर रोज नई नई कई विषय एक दूसरे जुड़े नजर आते है.जिस कारण दिमाग मे ट्राफिक जाम हो जाता है.
जैसे असम की NRC ने संसद में CAA जन्म लेकर भारतभर भुजाल मचाती हुई,शाहीनबाग में मुस्लिम महिलाओं को CAA, NRC,NPR के विरोध के लिए प्रेरणा बन गई ,दिल्ली विधानसभा के चुनावमे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करवाने के लिए एक विषय बन गयी.विरोध में खड़े रहनेवाले गद्दार और समर्थन में खड़े रहनेवाले भक्त लोकशाही (जमुरियत)में अजीब परिभाषा बनकर सामने आयी.गोदी मीडियाने भी खबरे खूब चलाई.आतंकवादी,देशके गद्दारो के जैसे कई इल्जामात की खैरात बाटी गयी.सुना है हनुमानजी का आशीर्वाद चुनाव जीतनेवाले के हक पायी गयी.
अमित शहा की सायलेंट सुनाई पड़ी,"नफरत के बयानबाजीसे हमे नुकसान हुआ है" साथ शाहीनबाग मे जोरके करंट की बात अब शाहीनबाग से चर्चा की बाते कैसे अमित शहा के जुबांसे निकली? बहोत सारे विद्वानोंने बहोत सारी बाते यूट्यूब के माध्यम से सुनाई और कहियोंने अपने विचार कही कोट करवाये कही विस्तारसे वर्णित किया.इलेक्ट्रॉनिक न्यूज मीडिया ने कई बुद्धिद्धिजीवी की औकात निकाली और बुद्धू एंकरों ने बुद्धू के भाषण को बढावा दिलाया.
ऐसे में कुछ लिखने के लिए जब भी मैं लिखने लेता तो विषयोंको लेकर दिमागका ट्रैफिक जाम हो जाता.बहोत सारे विषय सोंचमें आते ही बासी खबरों की तरह बन जाते.और कई दिग्धा हालात पैदा कर देते.किसीभी विषय को लिखने के लिए लिखने वालोका अपना अभ्यास और अपनी पढने वाले को प्रभावित करनेवाली सोंच का भी होना जरूरी होता है.लेकिन कभी लोगोकी हीनता को देखकर भी कलम लिखना चाहते हुए भी जब धीमी हो जाती है, तो बुद्धि खुद ब खुद नकारा (अकार्यक्षम) बन बैठती है.
हम भारतीय मुसलमानो की खासतौर पे बात करे अक्सर लोगोको उर्दु समझता लेकिन पढ़ते नही आता,अंग्रेजी समझमे आती नही,मकामी भाषा पढने तो आती है लेकिन लिखते आती नही.जो पढ़े लिखे कहलाते है, वो तो पढ़े के पढ़े रह जाते है.आज खासतौर पर हालाते हाजरा (वर्तमान हालात)में समाज को सही रहबरी ,रास्ता दिखाने के लिये लिखने वालो की कमी है. जो आसानी से बात और हालात को समझ सके.कहते है," दस बका एक लिखा !"
लिखी हुयी बात दूरतक जाती है और सदियों तक पायी और समझी जाती है. आज कई गलत बाते छपती है.हम जवाब दे नही पाते क्यों कि मुझे अच्छी तरह याद है.कुछ साल पहले शाहिद अब्दुल हमीद के बारे में निबंध याने एसे लिखने के स्कूलोमे कॉम्पिटिशन ली थी,कॉम्पिटिशन के लिए नंबर निकालने थे.तो मेरे सामने सवाल था, बदतर में बेहतर कौन?गर हालातको समझा जाये और संजीदगी के साथ सोंचा जाये ,तो मेरी सबसे गुजारिश है कि तुम सब भी लिखा करो.जिस जिसको साहिबे समझ और सोंच है,वो समाज के जरूर जरूर लिखे.
अफज़ल सय्यद,अहमदनगर,महाराष्ट्र
शायद मै जो कुछ सामाजिक मज़ामीन (आर्टिकल)लिखता हूँ, कुछ लोग पढ़ते है,कुछ लोग उसे पसंद भी करते है.दो रोज पहले एक फोन आया था.भाई आपका कोई नया आर्टिकल नही आया? फोन से अर्जी की गयी. मैंने खामोशी से फोन से फोन करनेवाले की बात को सुन लिया.फिर हल्की सी आवाज में कहा,"कुछ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ लेकिन कुछ बात जम नही रही" सामाजिक आर्टिकल भी बड़े अजीब होते है आजकल हर रोज नई नई कई विषय एक दूसरे जुड़े नजर आते है.जिस कारण दिमाग मे ट्राफिक जाम हो जाता है.
जैसे असम की NRC ने संसद में CAA जन्म लेकर भारतभर भुजाल मचाती हुई,शाहीनबाग में मुस्लिम महिलाओं को CAA, NRC,NPR के विरोध के लिए प्रेरणा बन गई ,दिल्ली विधानसभा के चुनावमे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करवाने के लिए एक विषय बन गयी.विरोध में खड़े रहनेवाले गद्दार और समर्थन में खड़े रहनेवाले भक्त लोकशाही (जमुरियत)में अजीब परिभाषा बनकर सामने आयी.गोदी मीडियाने भी खबरे खूब चलाई.आतंकवादी,देशके गद्दारो के जैसे कई इल्जामात की खैरात बाटी गयी.सुना है हनुमानजी का आशीर्वाद चुनाव जीतनेवाले के हक पायी गयी.
अमित शहा की सायलेंट सुनाई पड़ी,"नफरत के बयानबाजीसे हमे नुकसान हुआ है" साथ शाहीनबाग मे जोरके करंट की बात अब शाहीनबाग से चर्चा की बाते कैसे अमित शहा के जुबांसे निकली? बहोत सारे विद्वानोंने बहोत सारी बाते यूट्यूब के माध्यम से सुनाई और कहियोंने अपने विचार कही कोट करवाये कही विस्तारसे वर्णित किया.इलेक्ट्रॉनिक न्यूज मीडिया ने कई बुद्धिद्धिजीवी की औकात निकाली और बुद्धू एंकरों ने बुद्धू के भाषण को बढावा दिलाया.
ऐसे में कुछ लिखने के लिए जब भी मैं लिखने लेता तो विषयोंको लेकर दिमागका ट्रैफिक जाम हो जाता.बहोत सारे विषय सोंचमें आते ही बासी खबरों की तरह बन जाते.और कई दिग्धा हालात पैदा कर देते.किसीभी विषय को लिखने के लिए लिखने वालोका अपना अभ्यास और अपनी पढने वाले को प्रभावित करनेवाली सोंच का भी होना जरूरी होता है.लेकिन कभी लोगोकी हीनता को देखकर भी कलम लिखना चाहते हुए भी जब धीमी हो जाती है, तो बुद्धि खुद ब खुद नकारा (अकार्यक्षम) बन बैठती है.
हम भारतीय मुसलमानो की खासतौर पे बात करे अक्सर लोगोको उर्दु समझता लेकिन पढ़ते नही आता,अंग्रेजी समझमे आती नही,मकामी भाषा पढने तो आती है लेकिन लिखते आती नही.जो पढ़े लिखे कहलाते है, वो तो पढ़े के पढ़े रह जाते है.आज खासतौर पर हालाते हाजरा (वर्तमान हालात)में समाज को सही रहबरी ,रास्ता दिखाने के लिये लिखने वालो की कमी है. जो आसानी से बात और हालात को समझ सके.कहते है," दस बका एक लिखा !"
लिखी हुयी बात दूरतक जाती है और सदियों तक पायी और समझी जाती है. आज कई गलत बाते छपती है.हम जवाब दे नही पाते क्यों कि मुझे अच्छी तरह याद है.कुछ साल पहले शाहिद अब्दुल हमीद के बारे में निबंध याने एसे लिखने के स्कूलोमे कॉम्पिटिशन ली थी,कॉम्पिटिशन के लिए नंबर निकालने थे.तो मेरे सामने सवाल था, बदतर में बेहतर कौन?गर हालातको समझा जाये और संजीदगी के साथ सोंचा जाये ,तो मेरी सबसे गुजारिश है कि तुम सब भी लिखा करो.जिस जिसको साहिबे समझ और सोंच है,वो समाज के जरूर जरूर लिखे.
अफज़ल सय्यद,अहमदनगर,महाराष्ट्र



टिप्पण्या
टिप्पणी पोस्ट करा