सरकार और सरकारी योजना सिर्फ हम जैसो का मजाक और नाही तो क्या ?........
सरकार और सरकारी योजना सिर्फ हम जैसो का मजाक और नाही तो क्या ?........
बहोतसे गरीबो के पास कोई जमीन होती है,ना घरदार होता है.तो जाहीर है के बैंक बॅलन्स ज़ीरो होंगा ये कहने के लिए किसी एक्सपर्ट की जरूरत नही है.२०१४ के हर एक के बैंक खाते में १५ लाख चुनावी जुमलों ने चुनाव के बाद जन धन योजना में कई लोगोंने ज़ीरो बॅलन्स के खाते राष्ट्रीयकृत बैंकों में बडी उम्मीदों के साथ खोले थे.मगर एक रोज अमित शहा ने उसे चुनावी जुमला डिक्लेयर कर गरीबोंकी घोर निराशा कर डाली.
जन धन जीरो बैंक खाते का एक अनुभव (तजुर्बा) जले पे नमक छिड़कना किसे कहते है,उसी तरह एक मदारी(सपेरा
के परिवार से मजाक कर गया.मदारी के कर्ता आदमी की एक्सीडेंट में मौत हो गयी थी.किसी ने बात बात में बताया के,जन धन योजना जिसने राष्ट्रीयकृत बैंक में खोला है. एक्सीडेंट में मरने वाले व्यक्ति के परिवार को इन्शुरन्स के पैसे मिलते है.यह खबर सुनकर मदारी के कुछ मुझसे मिलने आये और बताने लगे कि मरनेवाले व्यक्ति का बैंक में खाता है और हमने इंश्योरेंस की बात सुनने में आयी है.आप हमारे साथ बैंकमे चलो.
वैसे खबर मैंने भी अखबार में पढ़ी थी.चलो कुछ गरीब को मदत मिलेंगी यह सोचकर मैं भी उनके साथ निकल पड़ा.बैंकमे जाकर अधिकारियों से पूछताछ पर पता चला के साल के १५ रुपये की इन्शुरन्स की रकम खाता खोलते वक्त जमा करने पर २.५ लाख का इंश्योरेंस का लाभ की योजना थी.लेकिन १०० रु.खाते में जमा तो थे.लेकिन १५ रु.इंश्योरेंस के जमा न होने एक गरीब मदारी का परिवार इंश्योरेंस के लाभ नही पा सका.हकीकत तो ये भी थी के मयत की १००रुपये बैंकमे ही जमा होनेवाले थे.क्योंकि १००रुपये निकालने के लिए ५००रुपये खर्चा था.भारतभर में कई गरीबोने राष्ट्रीयकृत बैंको में खाते तो खोले थे,मगर १५रु की इंश्योरेंस की रकम किसी ने नही भरी हुई थी.ऐसी ही होती है शासन की गरीबो की योजना.जिसके लिए निकाली जाती है.उसी को ही लाभ नही मिलता.जन धन का खाता खोल १५ लाख की उम्मीदमे जनता के पल्ले कुछ भी तो नही पड़ा. लेकिन खाता खोलने केलिए हजार पांच सौ का खर्च गरीबोंको सहना पड़ा.
राजीव गांधी आरोग्य योजना सरकार ने सुरु की थी.आज नाम बदलकर महात्मा फुले नाम कर दिया है.जिसमे बहोत सारी रोगों को शामिल किया गया है.उसकी अपनी लिस्ट वेब साइट पर होती है.अचरज की बात है के इनमे बहोत सारे प्रायवेट अस्पतालों का नाम तो होता है. मगर अस्पताल में लिस्ट मे दिये हुए रोग के इलाज का विवरण प्रायवेट अस्पताल वाले अजीबो गरीब तरीके से करवाकर रोगियों का ईलाज इस योजना में है ही नही बतला कर गरीब मरीजो को इंकार कर देते है.मिसाल हड्डी टूटने पर हड्डीके डॉक्टर हड्डीके अस्पताल में ईलाज करना चाहिये, मगर कैसे टुटा यह देखकर हमारी लिस्ट में इसका इलाज नही होता है, यह कहकर डॉक्टर ने इनकार करते देते है.
एक बार मेरे दोस्त की खाला के हार्ट की शिकायत होने लगीं थी.माली हालत कमजोर होने के वजहसे मुझे फोन किया और पूछा क्या करे भाई?मैंने आरोग्य योजना के लिस्ट में शुमार अस्पताल में जाने के लिए कहा.वो वहाँ अपनी खालाको रिक्षा में लेकर पहोंचा. लेकिन अस्पताल वालोंने ईलाज योजना के तहत लेनेसे मना कर दिया.मेरे दोस्तने फोन कर मुझको बताया के,अस्पताल वाले ईलाज करने से मना कर दिया. मैं कलेक्टर ऑफिसमें था.मैंने कहा तेरी खालाको कलेक्टर ऑफिस में ले आ.उसने ले आया. मैने और मेरे दोस्तने उसे कलेक्टर साहब के सामने वाली कुर्सी पर बिठा दिया.
कलेक्टर हमारी हरकतों को देख रहे थे.उन्होंने हमसे सवाल किया क्या प्रोब्लेम है.मैंने जवाब दिया,हार्ट प्रॉब्लम है खालाजान को.कलेक्टर साहब परेशानी से आवाज में बोले भाई, उन्हें अस्पताल ले जाना चाहिए ना, तो फिर यहाँ क्यो ले आये? मैंने कहा साहब आप जिला आरोग्य समितिके प्रेसिडेंट हों,इसलिए आपके पास ले आये.कलेक्टर सहाब मेरे बात को काटने की कोशिश कर,जरा गुस्से की आवाजमें बोले,भाई उन्हें हार्टका प्रॉब्लम है ना!तो इन्हे जल्द अस्पताल ले जाओ.मेरे सामने लाकर क्यो बिठाया ?मैंने कलेक्टर साहब से कहा, साहब राजीव गांधी योजना के तहत उन्हें योजनाके अंतर्गत प्रायवेट अस्पताल ले गए थे,मगर उस अस्पताल में खालाको एडमिट नही करवाया गया.
कलेक्टर साहब ने उस अस्पताल को फोन लगाया और हमे खालाको उस अस्पताल में अर्जेन्ट ले जाने को कहा.मैंने मेरे दोस्त को उसकी खाला को राजीब गांधी योजना अंतर्गत प्रायवेट अस्पताल में ले जाने को कहा, उसने अपनो खाला को ले गया.अब के अस्पताल वाले मानो खाला के इस्तकबाल के खड़े हुए थे.अब के VIP ट्रिटमेंट दी जाने लगी थी.अस्पताल वाले काफी नर्म आवाज में मेरे दोस्तसे बोले भाई, कलेक्टर साहब के पास जाने की क्या जरूरत थी. हमसे कहते,तो भी इलाज हो जाता था.मेरा दोस्त हल्कासा मुस्कराया और दिल ही दिल मे बोला,साले तब तो ढंग की बात भी करने को तैयार नही थे.....
अफजल सय्यद, अहमदनगर, महाराष्ट्र.
बहोतसे गरीबो के पास कोई जमीन होती है,ना घरदार होता है.तो जाहीर है के बैंक बॅलन्स ज़ीरो होंगा ये कहने के लिए किसी एक्सपर्ट की जरूरत नही है.२०१४ के हर एक के बैंक खाते में १५ लाख चुनावी जुमलों ने चुनाव के बाद जन धन योजना में कई लोगोंने ज़ीरो बॅलन्स के खाते राष्ट्रीयकृत बैंकों में बडी उम्मीदों के साथ खोले थे.मगर एक रोज अमित शहा ने उसे चुनावी जुमला डिक्लेयर कर गरीबोंकी घोर निराशा कर डाली.
जन धन जीरो बैंक खाते का एक अनुभव (तजुर्बा) जले पे नमक छिड़कना किसे कहते है,उसी तरह एक मदारी(सपेरा
के परिवार से मजाक कर गया.मदारी के कर्ता आदमी की एक्सीडेंट में मौत हो गयी थी.किसी ने बात बात में बताया के,जन धन योजना जिसने राष्ट्रीयकृत बैंक में खोला है. एक्सीडेंट में मरने वाले व्यक्ति के परिवार को इन्शुरन्स के पैसे मिलते है.यह खबर सुनकर मदारी के कुछ मुझसे मिलने आये और बताने लगे कि मरनेवाले व्यक्ति का बैंक में खाता है और हमने इंश्योरेंस की बात सुनने में आयी है.आप हमारे साथ बैंकमे चलो.
वैसे खबर मैंने भी अखबार में पढ़ी थी.चलो कुछ गरीब को मदत मिलेंगी यह सोचकर मैं भी उनके साथ निकल पड़ा.बैंकमे जाकर अधिकारियों से पूछताछ पर पता चला के साल के १५ रुपये की इन्शुरन्स की रकम खाता खोलते वक्त जमा करने पर २.५ लाख का इंश्योरेंस का लाभ की योजना थी.लेकिन १०० रु.खाते में जमा तो थे.लेकिन १५ रु.इंश्योरेंस के जमा न होने एक गरीब मदारी का परिवार इंश्योरेंस के लाभ नही पा सका.हकीकत तो ये भी थी के मयत की १००रुपये बैंकमे ही जमा होनेवाले थे.क्योंकि १००रुपये निकालने के लिए ५००रुपये खर्चा था.भारतभर में कई गरीबोने राष्ट्रीयकृत बैंको में खाते तो खोले थे,मगर १५रु की इंश्योरेंस की रकम किसी ने नही भरी हुई थी.ऐसी ही होती है शासन की गरीबो की योजना.जिसके लिए निकाली जाती है.उसी को ही लाभ नही मिलता.जन धन का खाता खोल १५ लाख की उम्मीदमे जनता के पल्ले कुछ भी तो नही पड़ा. लेकिन खाता खोलने केलिए हजार पांच सौ का खर्च गरीबोंको सहना पड़ा.
राजीव गांधी आरोग्य योजना सरकार ने सुरु की थी.आज नाम बदलकर महात्मा फुले नाम कर दिया है.जिसमे बहोत सारी रोगों को शामिल किया गया है.उसकी अपनी लिस्ट वेब साइट पर होती है.अचरज की बात है के इनमे बहोत सारे प्रायवेट अस्पतालों का नाम तो होता है. मगर अस्पताल में लिस्ट मे दिये हुए रोग के इलाज का विवरण प्रायवेट अस्पताल वाले अजीबो गरीब तरीके से करवाकर रोगियों का ईलाज इस योजना में है ही नही बतला कर गरीब मरीजो को इंकार कर देते है.मिसाल हड्डी टूटने पर हड्डीके डॉक्टर हड्डीके अस्पताल में ईलाज करना चाहिये, मगर कैसे टुटा यह देखकर हमारी लिस्ट में इसका इलाज नही होता है, यह कहकर डॉक्टर ने इनकार करते देते है.
एक बार मेरे दोस्त की खाला के हार्ट की शिकायत होने लगीं थी.माली हालत कमजोर होने के वजहसे मुझे फोन किया और पूछा क्या करे भाई?मैंने आरोग्य योजना के लिस्ट में शुमार अस्पताल में जाने के लिए कहा.वो वहाँ अपनी खालाको रिक्षा में लेकर पहोंचा. लेकिन अस्पताल वालोंने ईलाज योजना के तहत लेनेसे मना कर दिया.मेरे दोस्तने फोन कर मुझको बताया के,अस्पताल वाले ईलाज करने से मना कर दिया. मैं कलेक्टर ऑफिसमें था.मैंने कहा तेरी खालाको कलेक्टर ऑफिस में ले आ.उसने ले आया. मैने और मेरे दोस्तने उसे कलेक्टर साहब के सामने वाली कुर्सी पर बिठा दिया.
कलेक्टर हमारी हरकतों को देख रहे थे.उन्होंने हमसे सवाल किया क्या प्रोब्लेम है.मैंने जवाब दिया,हार्ट प्रॉब्लम है खालाजान को.कलेक्टर साहब परेशानी से आवाज में बोले भाई, उन्हें अस्पताल ले जाना चाहिए ना, तो फिर यहाँ क्यो ले आये? मैंने कहा साहब आप जिला आरोग्य समितिके प्रेसिडेंट हों,इसलिए आपके पास ले आये.कलेक्टर सहाब मेरे बात को काटने की कोशिश कर,जरा गुस्से की आवाजमें बोले,भाई उन्हें हार्टका प्रॉब्लम है ना!तो इन्हे जल्द अस्पताल ले जाओ.मेरे सामने लाकर क्यो बिठाया ?मैंने कलेक्टर साहब से कहा, साहब राजीव गांधी योजना के तहत उन्हें योजनाके अंतर्गत प्रायवेट अस्पताल ले गए थे,मगर उस अस्पताल में खालाको एडमिट नही करवाया गया.
कलेक्टर साहब ने उस अस्पताल को फोन लगाया और हमे खालाको उस अस्पताल में अर्जेन्ट ले जाने को कहा.मैंने मेरे दोस्त को उसकी खाला को राजीब गांधी योजना अंतर्गत प्रायवेट अस्पताल में ले जाने को कहा, उसने अपनो खाला को ले गया.अब के अस्पताल वाले मानो खाला के इस्तकबाल के खड़े हुए थे.अब के VIP ट्रिटमेंट दी जाने लगी थी.अस्पताल वाले काफी नर्म आवाज में मेरे दोस्तसे बोले भाई, कलेक्टर साहब के पास जाने की क्या जरूरत थी. हमसे कहते,तो भी इलाज हो जाता था.मेरा दोस्त हल्कासा मुस्कराया और दिल ही दिल मे बोला,साले तब तो ढंग की बात भी करने को तैयार नही थे.....
अफजल सय्यद, अहमदनगर, महाराष्ट्र.



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