क्या ये अमित शहा का जवाल (ढलने) का वक्त है ?

क्या ये अमित शहा का जवाल (ढलने) का वक्त है ?

      सात राज्य की विधानसभा चुनाव में भाजपा अमित शहा की नीतियाँ असर नही दिखा पाई.हाल में २०१९ के महाराष्ट्र, झारखंड और दिल्ली के चुनावी नतीजो ने मानो भाजपा को लकवा ही मार दिया.सामान्य आदमी की सरकार से बहोत कम आशाएं रहती है.जिनमेसे दो चार भी गर पूरी हो जाये तो,सरकार जिस पक्ष की हो उसे कामयाबी मील ही जाती है.दिल्ली विधानसभा चुनाव २०२० में आम आदमी पार्टी कामयाब रही और २०१९ के लोकसभा चुनावमे ७ एमपीज बड़ी वोट से जीत हासिल की थी.दोनो नतीजो को गौर करने पर २०१९ के लोकसभा के चंद महीनों बाद के २०२० विधानसभा के परिणामोमे उन्नीस बीस नजर नही आ रहा बल्कि सबकुछ उल्टा पल्टा नजर हो गया. ऐसा क्यों ?
क्या अमित शहा के जवाल याने ढलान का वक्त आया क्या?                               चर्चा तो होंगी ना!
    सूरज निकलता है तो ढलना तो पक्का (अटल) है. यह निसर्ग (कुदरत) का कानून है.झारखंड  विधानसभा चुनावमें CAA और NRC को लेकर चुनावी हंगामा खड़ा करने की कोशिश की, देश के पंतप्रधान मोदी ने भी कपड़े से पहचान बताकर ध्रुवीकरण (भेदभाव) का प्रचार किया.लेकिन हेमंत सोरेन के नेतृत्व पर झारखंड की जनताने पूर्ण  भाजपा को राजसत्ता से हटाया. जिस की जिम्मेदारी अमित शहा लेकर चल रहे थे.महाराष्ट्र तो मुख्यमंत्री पद का अहंकार ले डूबा.अब 2020 में दिल्ली विधानसभा में अमित शहा के जहाल नेतृत्वमे फिर बड़ी हार भाजपा को कबुल करनी पड़ी.जब के केंद्र की ताकतवर भाजपा की सत्ता हाथ मे है,जिस तरह २०१९ में चुने गए सात एमपीज की ताकत होते हुए भी एक  बड़ी महानगरपालिका के मानिंद दो करोड़ आबादीके ७० विधान सभा  क्षेत्र में भाजपा के आजिमाजी मुख्यमंत्री, लगभग २०० से ज्यादा एमपीज, केन्द्रीय मंत्रिमंडल,५००० आरएसएस कार्यकर्ता, अमित शहा के नेतृत्व में विकासपुरुष प्रधानमंत्री सहित दिल्ली विधानसभा काबिज करने निकल पड़े थे. लेकिन दिल्ली विधानसभा में पराजित हुए .
    धर्म की बुलेट झाड़ूसे बेअसर हो गयी.जब अहंकार सीमा को पार करता है तो,सबसे पहले बुद्धि को भ्रष्ट करता है,अच्छे बुरे की समझ को मार देता है और मैं मैं की नशामे बोहोष हो जाता  है.आसाम NRC का फसते  भाजपा के ही लीडरो की नाराजगीका सबब बन रही थी.क्योकि १५लाख हिंदू घूसखोर की गिनती में नजर आए थे. अब सवाल ये था के,असम के मुख्यमंत्री ने भी अपनी NRC याने नर्क के खिलाफ नाराजगी जाहिर की थी.अमित शहा गृहमंत्री पद पर विराजमान है.सत्ता हाथ मे है.तुरंत फैसला कर CAB ले आये,मुस्लिम छोड़ छह जाती को प्रताड़ित बताकर.अजीबोगरीब उदाहरण पेश कर संसद के दोनों सदनों में CAB को पारित कर CAA बना दिया.साथ संसद से एलान भी किया के,NRC भारत भर लागू किया जाएगा. अब मुसलमान जागा हुआ,सरकारकी नियत और आनेवाले खतरे को समझकर सरकार से CAA, NRC के वापस लेने की माँग लेकर भारतभर रास्तोपर निकल पड़ा.अमित शहा और भाजपा ने देशद्रोह जैसे इल्जामात लगाना सुरु कर दिया.इन दिनों में दिल्ली चुनाव भी चल रहा था. जैसा आप सब को पता भी है.CAA, NRC आंदोलन में शाहीनबागके लोगोने आंदोलन जिंदा रखने की अहम भूमिका ली.जिसेमें सभी मजहब के लोगों ने हिस्सा लिया.जो भारत के सभी मुसलमानो का प्रेरणा स्थान बना.
    CAA के विरोधी नही है गद्दार और देशद्रोही.विरोधी के अधिकार की रक्षा करना अदालत कि ड्यूटी है,देश मे संविधान का राज है,ना के  बहुसंख्यकों का!सर्वोच्च न्यायालय  है.लेकिन दिल्ली के चुनाव बुद्धिभेद करने की कोशिश की गई.शाहीनबाग के CAA NRC मुद्दे को लेकर देशद्रोह, गद्दार जैसी तोहमतें लगाकर हिंदू मुस्लिम वाद करवाने की कोशिश की गयी थी. अमित शहा ने झारखंड की सत्ता गवाने के बाद पूरी तरह प्रतिष्ठा की बना ली थी.गोली से लेकर भाजपा के विरोधी शाहीनबाग के महिलाओंको करंट देने की तक भाषा योगी से लेकर शहा जैसे मान्यवरोने भी कर डाली.कपिल मिश्रा ने शाहीनबाग को मिनी पाकिस्तान कहकर वोटो का  बटवारा करवाने कि की कोशिश की गई थी.भाजपा के नेताओ के गोली के बोली से जामिया और शाहीनबाग में बंदूक निकाली गयीं. जामिया के एक छात्र पर गोली लग गयी.इन सब के बाद दिल्लीके  मुसलमानोने खोमोशीसे अपनी भूमिका निभाई.इन सबके बाद दिल्लीके सभी मजहब के लोगोने अपनी समझदारी का सुबूत दे कर भाजपा को दिखला दिया.हजारो साल हिंदू मुसलमान रहते है हम एक साथ.कई ईद दिपावली हमने एक साथ मनाई.कोई भी ताकत नही कर सकते हम में जुदाई. लगता है दिल्ली वालोंने अमित शहा के जवाल (ढलने)के संकेत तो नही दिए?


  1. अफज़ल सय्यद, अहमदनगर,महाराष्ट्र.

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