व्यसनयुक्त इंसानो के किधरभी,कभीभी,कैसेभी थूकने विचित्र अवगुणों अंदाज का क्या कहना!
व्यसनयुक्त इंसानो के किधरभी,कभीभी,कैसेभी थूकने विचित्र अवगुणों अंदाज का क्या कहना!
कोरोना लॉक डाउन में टू व्हीलर जा रहे एक नवजवान को चौराहे पर बंदोबस्त के लिए ठहरे पुलिसों ने रोक दिया और पोलिसी लाठीप्रहार सुरु किया.एक पोलिस ने पूछा बे वजह कहा घूम रहा.पोलिसी प्रहार से पहले ही घबरा हुआ था और कहते है ना पोलिसी प्रहार अच्छे अच्छे से सच उगलवा देता है.कुछ शर्मिंदगी के साथ नवजवान बोल पड़ा," तमाकू की पुड़ी लाने गया था "अक्सर पोलिस भी तमाकू का व्यसन रखते है.पोलीस भी नवजवान का जवाब सुन कर है पड़े नवजवान को हल्का सा लाठी प्रहार करते नवजवान टू व्हीलर को किक मार निकल पड़ा.
बहोत सारे व्यसनाधीन व्यक्ति को बिना तमाकू जरूरत (टॉयलेट) की काम होती ही नही,मिसरी बिना घर काम बहोत सारी महिलाये कर नही पाती.केरला में कुछ अटल बेवडेलोगोने शराब मिलने के लिए मांग की है. शराब पीनेवालो ने पहले कुछ स्टॉक कर लिया था.थोडी थोड़ी कर कुछ दिनों निकल गये थे.अब स्टॉक खतम हो चुका है.किसीके हाथ थरथराने लगे है,कुछ को बुरे बुरे भास होने लगे है,कोई अत्यावस्थ महसूस करने लगे है.लॉक डाउन में वाइन शॉप फोड़ी गयी ,ये खबर सब ने पड़ी और सुनी भी है.सूखे और गिकले नशेखोर लॉकडाउन खुलने के इंतजार में है.
मुझे एक किस्सा याद आया, कुछ ऐसाभी होता है.
होटल में चाय या नाश्ते के लिए आता है,अक्सर लोगो के मुँह में गुटका,तमाकू पायी जाती है.जब होटलवाला गरम चाय का कप या ग्लास आपके सामने ले आता,तो चाय के लिए कुल्ली करना कम्पलसरी (जरूरी)होता है.टेबलपर रखा हुआ पाणी का जार उठाया जाता और पहले मुँह में जमा हुआ चौथा जो थूका जाता है. वो इस चित्र में नजर पौधे पर आ रहा,यह मेरा अपना अनुमान साथ निरीक्षण है.आप सभी इस बात से सहमत हो ये मेरा यकीन है.
मुझे अच्छी तरह याद है,न्यायालय(कोर्ट) में के पाँच माला इमारत में शायद दो या तीन पोलिस शिपाई सिर्फ मावा, गुटका, तमाकू कहा कर थुकनेवालोको खासकर रंगे हाथ पकड़ने के लिए न्यायाधीश (जज) ने नियुक्त किया थे.कुछ दिन पहले एक पुलिसकर्मी के तमाकू मुँह में देख न्यायाधिश महोदय ने सम्पूर्ण न्यायालयीन इमारत, जहां जहां व्यसनाधीन लोगो ने मावा गुटका तमाखू,खाकर पिचकारियां मारी थी वह जगह साफ करने की शिक्षा दी थी.दोपहर दो से तीन बजे के दरमियान कोर्ट का लंच टाइम होता है.इस दरमियान में लगभग दो चार लोगों को पुलिसों ने पकड़कर न्यायाधीश के सामने कोर्ट में हाजिर किया.न्यायाधिश महोदय ने पाचसौ के करीब दंडात्मक शिक्षा सुनाई.कोर्ट बंद होने में घंटा डेढ़ घंटा बाकी था.दंडात्मक शिक्षा प्राप्त अनेकोके पास पाच सौ रुपये खीसेमे नही थे.न्यायालय का दंड तो भरना ही था.
समय भी बहोत कम था.कोर्ट के बाहर भी दंड की रकम भरे बिना जा भी नही सकते थे.न भरनेपर एक रात कारावास में गुजारनी पडेंगी.इस वजह से सभी के चेहरे पर मातम नजर आ रहा था.कोई करीबी जान पहचानवाला गर दिखता तो गमगीन हालात में थोड़ीसी उम्मीद चेहरे पर नजर आती, इस उम्मीद से चलो कुछ ना कुछ काम बन जायेगा.पहचानवालो को आवाज दे करीब बुलाया जाता,उम्मीद के साथ शार्ट में कहानी सुनाई जाती के दण्ड के पांच सौ रुपये का तुरंत इंतेजाम हो जाये.जिस की पास होते वो खीसेमे हाथ डाले रुपये अनोखेभाव से दे देता.किसी के पास गर कम हो तो वो भी रुपये निकालकर देता,साथ ही जान पहचान वाले को फोन कर रुपये का इंतजाम करने की कोशिश पूरी हो गयी थी.
कोर्ट बंद होने से पहले पहले कोर्ट की इमारत में थूकने पर दंडात्मक शिक्षा प्राप्त सभी ने रुपयोंका जुगाड़ कर दंड की रकम भर दी थी.दंड की पर्याप्त रकम न होने पर जान पहचानवाले,करीबी,रिस्तेदार के एक दिन की अटक ना हो इस भाव से मदत करना अच्छा तो था,पर क्या दंडात्मक शिक्षा प्राप्त व्यसनीव्यक्तिने गुटका,मावा,तमाकू का व्यसन छोडा होंगा ? निश्चित आपका उत्तर होगा 'नही!'
सरकारी कार्यालय के बाहरी हिस्से,बाबू की खिड़कियां,इमारत की सीढ़िया,कीसीभी नुक्कड़ के चाय के ठेला,होटल,पान दुकान,सार्वजनिक वाचनालय, सरकारी अस्पताल,कहा कहा लाल मुहँ की पिचकारियां से कोने दीवार,खिड़कियां रंगी ना हो ऐसा ठिकाना ना मुमकिन है.जो पोलिस न्यायालय में ड्युटी कर रहे थे,वह न्यायालय के मावा गुटके को थूंकते पकड़ने की ड्यूटी से परेशान थे. निन्न्यानो फीसदी पोलिस भी तो व्यसनाधीन पाए जाते है.ड्यूटी तो ड्यूटी होती है.मरता क्या ना करता सी हालत थी.
व्यसन आज दोस्ती का,परिचय का प्रतीक बन गया है.तमाकू खीसे में चुने के लिए अनजाने से परिचय कर चुनेकी पूंछताछ होती है.गर चुना होतो दोनों मिलकर तमाखू चुना मिश्रितकर हाथ की हथेली पर मसलकर अपनी व्यासनाग्नि को शांत करते है.चिलम जब भी सुलगती है महफ़िल में पाँच सात साथी जरूर होते है.चिलमवाले जहां कही भी चले जाते है,महफ़िल ढूंड ही लेता है.नायंटी और चपटी, देशी विदेसी के तलबगार भी आज आम हो गए है.हकीकत दोस्ती तो बना लेते है.
सरकारी व्यसनमुक्ति कार्यक्रम का प्रमुख ही व्यसनमुक्ति की कई कसमे खा चुका होता. सामाजिक संगठन के अध्यक्ष, कार्यकर्ते भी व्याख्यान आयोजित करते है.व्यसन के परिणाम का स्लाईड शो देखकर दो चार दिन जो भी व्यसन से दूर रहते है.एखादा व्यसनयुक्त तर्कशास्त्री एक दो निर्व्यसनी के मरनेके उदाहरण देकर,साहस भर देता है.दो दिन पहले शपथ ले व्यसनमुक्त बना अध्यक्ष दो दिन बाद व्यसनयुक्त हो जाता है.याने सारा व्यसनमुक्ति का कार्यक्रम खबरों में ही छपता है और परिणाम शून्य होता है.आज कल तो नारियां भी बड़े पैमाने में व्यसनाधीन होते जा रही है. व्यसन से बहोत सारो को अंतिम यात्रा कर चुके है,कतार में भी बहोत है.
फिर भी व्यसनाधीन व्यक्ति शोखियां भी बहोत मारता है.एक शख्स ने शोखी बगारते हुए कहा,मैंने तो कई ट्रक भर के गांजा पी लिया होंगा,कोई कहता है,मैं एक साथ चार चार गुटके की पुड़िया खाता हूं.कोई कहता है,कितनी भी पिता हुं मगर हिलता डुलता नही हूँ,कोई कहता है,मैने तय हर तरह का नशा किया है.यही चर्चा आजकल होती है.दूसरे को भी नशे के लिए प्रेरित करती है.ये बढाही चिंता का विषय है.अवगुण आज प्रतिष्ठा बन गयी है.जी बूढ़े,जवान,बच्चे हर एक मे पायी जाने लगी है.गुणवान अब पिछड़ा जाने लगा है.
गर समझो तो संभाल जाओ यारो, जिंदगी अनमोल है.
(अफजल सय्यद, अहमदनगर)
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