"इलेक्शन अब खरीदा जाने लगा है.क्यों कि हमारा वोट भी तो बिकता है!"
"इलेक्शन अब खरीदा जाने लगा है.क्यों कि हमारा वोट भी तो बिकता है!"
जब जब इलेक्शन आता है,उमीदवारों के माली हालात(धन संपत्ति)पर विशेष कर उसकी जीत पक्की होती है.उसका सामाजिक कार्य नही देखा जाता है बल्कि उसके बाहुबल(दहशत) को देखकर सियासी पार्टीयाँ तो उम्मीदवारी देना पसंद करती है.और हम भी वोटो का दाम लगाकर बेचते है.ये जो भी होता है वोट देनेवाले में बहुसंख्या में होता है. बताओ भला ग्राम पंचायत का सद्स्यसे भी विलास की उम्मीद कैसे भला कर सकते है?
हम वोट भला क्यों बेचते है,इस बात पर मुझे एक किस्सा याद आया.एक गोडाउन में 10 बंदर जमा किये और ऊपर केले का गुच्छा बांध कर रखा गया.साथ ही वहा तक पहुंचने सके इसलिए एक सीडी लगाई गई.एक बंदर ने शिडी पर चढने कर केले तक पहुंचता तो उसे लकड़ी से मारकर हकला गया.अब ये सिलसिला चलता रहा.सब बंदरो को आता चला के केले के पास पहुंचने पर लकड़ी से मारा जाता है.कोई केले के पास जा र नही रहा.उस दस बंदरो में से दी बंदर कम कर नए दो बंदर गोडाउन के अंदर डाल दिये.अब वो नए बंदर में से एक बंदर उपर जाने शिडी पर चढ़ा तो पहले बंदरो के उसे ऊपर जाने से रोका.क्योकी पहले बंदरो को ये मालूम था के,ऊपर केले के पास पहुंचने पर लकड़ी से मार पड़ती है.इसलिए वो नए बंदर को शिडी पर चढते ही रोक देते.अब सिलसिला चलता के जुने बंदर दो दो कर निकाले जाते.नए अंदर गोडाउन में डाले जाते.अब कोई बंदर शिडी पर चढने की कोशिश करता,उसे बाकी बंदर रोक देते.जुने सब बंदर गोडाउन से निकल चुके थे जिसने लकडी से मार खाया था.मगर अब गोडाउन में जब कोई बंदर शिडी पर चढ़ने की कोशिश करता.उसे रोकने का रिवाज पड गया था.अब किसीभी बंदर को ये मालूम नहीं था.क्यो रोका जा रहा है. सब बंदरो ने मानो शिडी पर न चढने की रिवाज को काबुल कर लिया था.उसी तरह अब भारतीय समाज मे पैसे लेकर वोटिंग हमारे पुरखोने सुरु की थी.अब वह नई पीढ़ी के लिए रिवाज ही बन गया है.
अब पैसे लेकर वोटिंग कराने की लिए बाहुबल(दहशत) का इस्तेमाल होने लगा.इलेक्शन लढाने के बल और पैसा ये काबिलियत (पात्रता)सभी सियासी दलों में अहम मानी जानी लगी है.जो पैसा बाटेंगे उनसे हम कैसे उम्मीद कर सकते. हम भी तो जिम्मेदार है.जो पैसे लेकर वोटिंग करने वाले रिवाज को रोकने की कोशिश आज तक नही कर रहे गई.
सभी वोट करनेवाले मतदाताओं से अपील है के हम को ऊपर वाले ने अच्छे बुरे की समझ दी है.देखते नही, सरकार मुफ्त और सक्ति का एजुकेशन का आदेश निकालती है.मगर सरकारी स्कूलों के बंद हो रहे है.इसपर कोई काम नही कर रही.खासगी स्कूलों से पैसा मिलता है ना.सरकारी अस्पतालों की हालत बदतर हो गयी.खाजगी इस्पतालो से पैसा मिलता है ना.सरकारी योजना हो बदतर हो रही.खाजगी में पैसा मिलता है.बड़े धनवानों को बड़े बड़े कर्ज बार बार मिलते है.भले ही वो दुबे क्योके वो इलेक्शन को पैसा देते है ना.और हमे कर्ज कहा मिलता है.क्यो की हम वोट के लिए पैसा लेते है ना.
अब हम सोंचे कितनी है हमारी हैसियत.हम बड़े गर्व से कहते है के दुनिया की सबसे बड़ी लोकशाही(जमुरियात)में हम रहते है. तो क्या हमे वोट बेचने का अधिकार है?आप सब से बिनती है के आप अपना वोट कीमती जरूर है,उसकी पैसों पर कीमत ना लगाए.उसे बेचो नही. हम आज अगर इस बात को नही रोक पाए तो हमारी आनेवाले बच्चो को तरक्की पैसों पर ही गिनी जाएगी.चंद लोगोके हाथ मे पैसा होंगा और हमारे बच्चों के तकदीर में गुलामी.जिसकी सुरुवात हो ही चुकी है.बीमारी का इलाज सुरु में किया जाए तो मुमकिन है वो रुक जाए वर्ना. "सभी मतदाता से अपील है के हम अपना वोट पैसे पर बेचे नही"
अफजल सय्यद



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