"सशक्त भारत रहे,एक फिक्र बड़ के पेड़ के जुबानी."

"सशक्त भारत रहे,एक फिक्र बड़ के पेड़ के      जुबानी."


     सुबह फजर की नमाज के बाद बढाती उम्र की शिकायतों समझते हुए.सेहत की तंदरुस्ती का खयाल करते हुए ,दूर दराज की पैदल फिराने का शेड्यूल कायम किया है.उस मुताबिक  जब मै फिरने निकलता हूँ .पिछले कई दिनोसे रास्ते में एक बड का झाड लगता है.बड का वो झाड मानो जैसे चुनौती देता है.जैसे कहता था ,
"है हिम्मत तो झूला लेकर दिखा."
मैने अपनी उमर और कूवत को जानकार ख़ामोशी इख़तियार कर ली थी.जो मेरे अपने मिजाज़ के खिलाफ था.पिछले कई दिनोसे मै बड के पेड़ से दोस्ताना अंदाज में नूरानी अंदाज सी कुश्ती की तरह हल्का हल्का लटकने की कुछ कोशिशे करनी चाही. तो अपनी जिस्म की औकात समझने लगी. जिस्म के अलग अलग पुरजे (पार्ट) अलग अलग दर्द की बोली बोलने लगे थे.कहते है ना,समझदार को इशारा काफी. मैंने दिल में ठान ही लिया था.बड का पेड कितनीही चुनौती क्यों न दे,उसे नजर अंदाज कर रास्तेसे सीधा चल गुजरता. मगर इंसान की फितरत में होता है ना,जब भी पेड के करीब करीब मैं आने लगते तो चुनौतीयां अपने आप दिलमे उछाल मारना सुरु हो जाती. दिल को रुझाने की समझने की बार बार कोशिशे करता.
     वो बचपन हमने बड के झाड पर खेल कूद गुजारा था वो यादे सताने लगती.बड के पेड़ से उन लटकती हुई डाली को लटककर हम बच्चों का  जोर से झूला लेकर झाड पर चढ़ जाना और सुरपारंबी दोस्तों के साथ खेलते वक्त कई बार झाड पर लटकते हुए डाली से चलाखी से हवा के झोंकोसे चढ जाते थे और उसी तरह उतर भी जाते थे. इसके बावजूद थकना मानो हमारे फितरत में नहीं था.मगर आज डालीसे झुलाना मेरे बस में ही नहीं इसे दिलने आसानीसे कबूल कर लिया था.
    आज मै बड के पेड के पास कुछ देर  ठहरसा गया. उसने आज मुझपर मोहनी कर डाली,मोहबताना नज़र का असर लग रहा था.वो कह रहा था,
 "तुझ जैसे कइयों का बचपन मेरे गोद मे खांदो पर हंसते खेलते गुजरा है. जैसा मुझे देख तुझे तेरा बचपन याद आता है ना!उसी तरह मुझे भी तो तुम जैसे बच्चों की याद बहोत सताती है. समझता है तू ? मै तुझको चुनौती क्यों दे रहा था? पिछले कई सालों से कोई भी बच्चा मेरे गोदमें खांदो पर खेलाही नहीं.वैसे तो राहगीर बहोतसे इस रास्तेसे आते और जाते है. उनकी सूरत से महसूस होता है,किसीके पास कोई फुरसत ही नहीं अपने बारे में सोचनेकी. "
     कुछ देर बड का झाड चुप सा रहा और फिर मुझसे कहने लगा,
"तू जानता है,मैं तुझे चुनौती क्यों दिया करता हूँ?"
मैने गर्दन हिलाकर कहा,
 "नहीं."
बड के पेड़ कहता है,
" सुन, तू जो रोज यहाँ से गुजरता है, तो मेरे डाली को छूकर जाता ही है. मैं उस वक्त तेरे नजरो झाँकती और पढती हुँ, तो साफ साफ दिखाई पडता है के ,तू बचपन की तरह डाली को लटककर झुलाना चाहता है.लेकिन डरता है अपने आप से कही गिर ना पड़े.सच बात कही हैं ना बच्चा ? "
और  मुझसे हल्की सी प्यार भरी आवाज में बोल पड़ा,
"चल झूल ले झूला आज.मै हूँ ना बच्चे ! तू तो भी मेरा बच्चा ही है ना. मेरे दिल के अरमान  कर दे पूरे. ऐ अफजल  चल झूला झूलले,चल झूला झूलले."
अब मैंने भी तो आव देखी ना ताव देखी,एक जोर जो लगाया .पल में ईधरसे उधर उधरसे इधर देखते देखते कई झूले झुल गया.खुशियों से फुले मैं भी समाया न था और  खुशियोंसे फुले न बड का पेड़ समाया था.जब मै कुछ देर बाद निकलने लगा,तो नसीहत वाली बात कही.
"
तुम्हारे बच्चे बड़े कमजोरसे लगते है. कभी कभी हमारे कांदो पर खेलने लाया करो.घर और मोबाइल से निकालकर मैदान में ले जाया करो.देखा ना आजभी तेरे कांधे मुजबूत का राज मेरा भाई बढ़ का ही पेड़ ही है ना....      
"सुदृढ़ रहेंगे बच्चे,तो सशक्त बनेगा भारत! "
दो साल बाद मैं आज उस राह से गुजरा ,तो  नया जिलाधिकारी कार्यालय निर्माण का काम अब आखरी चरणों मे है.रास्ते पर काट पड़े बड़ के पेड़ के अंग है.खामोशी को देख कर आँखभर आयी. 


                        अफज़ल सय्यद,अहमदनगर,महाराष्ट्र.

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