सिग्नल के खिलौने बेचनेवालो को झिड़का तो देते है हम.आज दीपावाली पर भी बच्चो के खुशी लिए खड़े है सिग्नल पर...
सिग्नल के खिलौने बेचनेवालो को झिड़का तो देते है हम.आज दीपावाली पर भी बच्चो के खुशी लिए खड़े है सिग्नल पर...
हाल ही में विधानसभा के चुनावी नतीजे का एलान हुआ और साथ ही दीपावाली सुरु हुई.दीपावली की छुट्टी होने की वजह से घर मे वक्त गुजारना बडा मुश्किल लग रहा था.सोंचा जरा कुछ दोस्तों को से मुलाकात कर आये.इसलिए टु व्हिलर को स्टार्ट कर शहर का रुख कर निकल पड़ा.दोस्तो से मुलाकात करने के बाद जैसे मैंने तय किया था कि आज मैं सिर्फ सुनने का काम करूंगा ना के किसीके हिमायत या विरोध में कुछ बात कहूंगा.मगर दोस्तो से सलाम के बाद पहला सवाल मुझसे ही किया.मानो जैसे मैंने किसी मुसलमान उमेदवार का समर्थन कर कोई बहोत गलत काम किया है.
जमुरियत (लोकशाही)की खासियत ये है के हर एक भारतीय नागरिक को अपनी अपनी पसंद के उमीदवार को वोट देने का अधिकार है.लोकशाही में ऐसा नही के जीत कर आने वाले को वोट न देना माने वोट की कोई कीमत नही या कोई जुर्म हो गया हो.दोस्तो का रवैया देख मुझे ऐसा महसूस हो रहा था.क्या। मैन हकीकत में जितने वाले उमेदवार के विरोध प्रचार और वोट कर इतना बड़ा गुनाह तो नही किया? अजब बात ये भी थी के मेरे दोस्त ने भी जितने वाले उमीदवार के हक़ में वोट नहीं किया था. सिर्फ उनका उमीदवार हमारे मजहब का ना था.
आज मेरा रोल सुनने का था.तो मैं सिर्फ सुन रहा था.मैंने अपने हक में सिर्फ इतना कहा मेरी सोंच के हिसाब से मैने फैसला किया.आप ने आप के हिसाब से.जितने वाले उमीदवार के करीबी और हमारे दोस्त हमारी साथ बातचित में कुछ सामिल हुए. उन्हीका कहना भी कुछ अलग सा था.मैं खामोशी से सुन रहा था.कुछ सुनने के बाद मुझको कहना पडा,"अस्सी साल के बुजुर्ग जवान शरद पवारको इस चुनाव में इसलिए महाराष्ट्र की भागदौड़ हाथ मे लेनी पड़ी के जिसके जिम्मे पार्टी सौपी वो कुछ काम के नही थे."मेरी बात का विरोध कोई कर नही पाया.हकीकत तो यह भी थी के एक बुजुर्ग शख्सियत ने अपने बलबूते पर 50 से ज्यादा उमीदवार जीता के लाए थे.मगर पक्ष के नाम पर कभी महाराष्ट्रा की सत्ता में रहनेवाले बड़े बड़े दिग्गज पक्ष की ताकत बढ़ा नही पाए बल्के पिछले चुनाव का नतीजा देखे तो कमजोर कर दिया था.हमारे समाज के लोगोकी हालात तो बेगानी शादी में अब्दुल्लाह दीवाना जैसी.
फिर एक रिश्तेदार से मुलाकात हुई.अंदाज गुफ्तगू सलाम के बाद फिर दोस्तो से हुई जैसी ही थी.क्या समाज के उमीदवार की चुनाव में हिमायत करना सच मे बहोत बडा गुनाह तो नही!ऐसा महसूस होने लगा.रिस्ते में छोटा होने के बावजूद मैंने उससे कहा.'सुनावो भाई अपनी बात,क्यो के आज कल बच्चोका सुनना पड़ता है.' लगाता मानो आज रिस्तेदार के तय कर दिया था,मुझसे कभी अनजाने में हुए कोई गलती का बदला ले तो नही रहा? मुझको रामदेव बाबा का देखा एक इंटरव्यूव याद आया.बाबा टीवी ने कहा "आज मैं सैलिब्रिटी हूँ, और मेरे पास बहोत दौलत है.इसलिए मेरी बात को आज आप दिखा रहे.यही बात मैं तब भी लोगोसे कहता था.मगर कौन कहा सुनता था.आज करोड़ो मेरे भक्तगण है.मेरी हर बात को प्रमाण मानते है." जब मैंने उसे सुनाई.तो कहने लगा.'ऐसी कोई बात नही.हम आपकी बात को कहा विरोध करते है'.
आखिर में मेरी पहलेसी बात को शायद कुछ समझने लगा हो ऐसा उसकी हरक़ातों से लगने लगा था. मोबाइल की रिंग बजने लगी.देखा लड़के का है.'घर मे खाने के लिए याद कर रहे है.' मजाकाना अंदाज में फरियाद की और साथ दुकान से कालाखट्टा कलर लाने को भी कहा.हमने फोन रख घर की तरफ निकल पड़े.इतवार होने की वजह से अक्सर दुकाने शहर ने बंद रहती हैं. इस बात की जानकारी मुझको थी.फिर भी जाते जाते देख लेना.मैं दुकान के रास्ते से गुजरा तो दुकान खुली पाई.पूजा के लिए खुली हुई थी.दुकान के सामने अलग अलग रंगोंकी रंगोली निकाली हुई थी.प्रसन्न वातावरण दुकान में दिखाई दिया.और दुकानदार के बच्चे बाहर फुलझड़ियां फटाकडे उड़ा रहे थे.बाद डीएसपी चौक के सिग्नल पर रुकने पर सामने खिलौने बेचनेवाले शख्सपर नजर पड़ी.मैले कुचले कपड़े,हाथ मे तीन चार हवाई जहाज लिए एक कार के दरवाजे में खड़ा,नजरमें एक रिक्वेस्ट '' लेलो भाई! एक खिलौना,इससे तुम्हारा बच्चा खेलेगा तो हमारे बच्चे हैं आज शाम दिवाली बनाएगा"कैसा ये भेद.
मैं सोचते सोंचते अपने मोहल्ले से घर की तरफ रुख करते.हमारे मोहल्ले में मस्जिद से कुछ ही दूरीपर फटाकडे के कई दुकान और बच्चे की दुकान पर भीड़ नजर आयी.कई बच्चे फटाकडे बजाते नजर आ रहे तो कई फटाकडे की आवाज से खुशियोसे उछल रहे थे.वो सब जातीके मुसलमान थे.आज दीपावाली का दिन एक बच्चा नए कपड़े दुकान में पूजा की जा रही है पहने है.एक का बाप मैले कुचले कपड़े पहने बच्चो केलिए खिलोने बेच रहा है.वो भी हवाई जहाज.ये नजारे ईद में भी दिखाई देता है.एक बच्चा फिरते झूले में झूलता है तो एक बच्चा भिक मांगता नजर आता है.विधानसभा चुनाव में इस बात पर कोई चर्चा कहाँ थी.चर्चा तो मंदिर मस्जिद पर,चर्चा तो हिन्दू मुस्लमान पर,चर्चा कहा होती है गरीबी पर,लगता है गुप्त चर्चा हो तो हो शायद गरीब हिन्दू हो या मुसलमानों के हटानेपर!....
सच तो यह भी है ना हमने भी तो वोट दिया है ना लोकसभा या विधानसभा मे जात के नाम पर!क्योकी हमने ईद दीपावालीपर सिग्नल के खिलौनेवाला /वाली को करीब आनेपर झिड़काया तो होंगा.कभी जाती जानने की कोशिश करते तो देश का कोई भी चुनाव धर्म के नाम पर ना लढ़ा जाता,ना कभी कामयाब होते धर्म के नाम पर जहर फैलानेवाले, ना कोई धर्म के नाम पर जीतकर सत्ता में आता. आज हमारे मुस्लिम मोहल्ले में भी फटाके बच्चे उड़ा रहे है.सोंचो अपने बच्चोके भविष्य केलिए आज दीपावाली के मौके पर.....
(अफजल सय्यद)
हाल ही में विधानसभा के चुनावी नतीजे का एलान हुआ और साथ ही दीपावाली सुरु हुई.दीपावली की छुट्टी होने की वजह से घर मे वक्त गुजारना बडा मुश्किल लग रहा था.सोंचा जरा कुछ दोस्तों को से मुलाकात कर आये.इसलिए टु व्हिलर को स्टार्ट कर शहर का रुख कर निकल पड़ा.दोस्तो से मुलाकात करने के बाद जैसे मैंने तय किया था कि आज मैं सिर्फ सुनने का काम करूंगा ना के किसीके हिमायत या विरोध में कुछ बात कहूंगा.मगर दोस्तो से सलाम के बाद पहला सवाल मुझसे ही किया.मानो जैसे मैंने किसी मुसलमान उमेदवार का समर्थन कर कोई बहोत गलत काम किया है.
जमुरियत (लोकशाही)की खासियत ये है के हर एक भारतीय नागरिक को अपनी अपनी पसंद के उमीदवार को वोट देने का अधिकार है.लोकशाही में ऐसा नही के जीत कर आने वाले को वोट न देना माने वोट की कोई कीमत नही या कोई जुर्म हो गया हो.दोस्तो का रवैया देख मुझे ऐसा महसूस हो रहा था.क्या। मैन हकीकत में जितने वाले उमेदवार के विरोध प्रचार और वोट कर इतना बड़ा गुनाह तो नही किया? अजब बात ये भी थी के मेरे दोस्त ने भी जितने वाले उमीदवार के हक़ में वोट नहीं किया था. सिर्फ उनका उमीदवार हमारे मजहब का ना था.
आज मेरा रोल सुनने का था.तो मैं सिर्फ सुन रहा था.मैंने अपने हक में सिर्फ इतना कहा मेरी सोंच के हिसाब से मैने फैसला किया.आप ने आप के हिसाब से.जितने वाले उमीदवार के करीबी और हमारे दोस्त हमारी साथ बातचित में कुछ सामिल हुए. उन्हीका कहना भी कुछ अलग सा था.मैं खामोशी से सुन रहा था.कुछ सुनने के बाद मुझको कहना पडा,"अस्सी साल के बुजुर्ग जवान शरद पवारको इस चुनाव में इसलिए महाराष्ट्र की भागदौड़ हाथ मे लेनी पड़ी के जिसके जिम्मे पार्टी सौपी वो कुछ काम के नही थे."मेरी बात का विरोध कोई कर नही पाया.हकीकत तो यह भी थी के एक बुजुर्ग शख्सियत ने अपने बलबूते पर 50 से ज्यादा उमीदवार जीता के लाए थे.मगर पक्ष के नाम पर कभी महाराष्ट्रा की सत्ता में रहनेवाले बड़े बड़े दिग्गज पक्ष की ताकत बढ़ा नही पाए बल्के पिछले चुनाव का नतीजा देखे तो कमजोर कर दिया था.हमारे समाज के लोगोकी हालात तो बेगानी शादी में अब्दुल्लाह दीवाना जैसी.
फिर एक रिश्तेदार से मुलाकात हुई.अंदाज गुफ्तगू सलाम के बाद फिर दोस्तो से हुई जैसी ही थी.क्या समाज के उमीदवार की चुनाव में हिमायत करना सच मे बहोत बडा गुनाह तो नही!ऐसा महसूस होने लगा.रिस्ते में छोटा होने के बावजूद मैंने उससे कहा.'सुनावो भाई अपनी बात,क्यो के आज कल बच्चोका सुनना पड़ता है.' लगाता मानो आज रिस्तेदार के तय कर दिया था,मुझसे कभी अनजाने में हुए कोई गलती का बदला ले तो नही रहा? मुझको रामदेव बाबा का देखा एक इंटरव्यूव याद आया.बाबा टीवी ने कहा "आज मैं सैलिब्रिटी हूँ, और मेरे पास बहोत दौलत है.इसलिए मेरी बात को आज आप दिखा रहे.यही बात मैं तब भी लोगोसे कहता था.मगर कौन कहा सुनता था.आज करोड़ो मेरे भक्तगण है.मेरी हर बात को प्रमाण मानते है." जब मैंने उसे सुनाई.तो कहने लगा.'ऐसी कोई बात नही.हम आपकी बात को कहा विरोध करते है'.
आखिर में मेरी पहलेसी बात को शायद कुछ समझने लगा हो ऐसा उसकी हरक़ातों से लगने लगा था. मोबाइल की रिंग बजने लगी.देखा लड़के का है.'घर मे खाने के लिए याद कर रहे है.' मजाकाना अंदाज में फरियाद की और साथ दुकान से कालाखट्टा कलर लाने को भी कहा.हमने फोन रख घर की तरफ निकल पड़े.इतवार होने की वजह से अक्सर दुकाने शहर ने बंद रहती हैं. इस बात की जानकारी मुझको थी.फिर भी जाते जाते देख लेना.मैं दुकान के रास्ते से गुजरा तो दुकान खुली पाई.पूजा के लिए खुली हुई थी.दुकान के सामने अलग अलग रंगोंकी रंगोली निकाली हुई थी.प्रसन्न वातावरण दुकान में दिखाई दिया.और दुकानदार के बच्चे बाहर फुलझड़ियां फटाकडे उड़ा रहे थे.बाद डीएसपी चौक के सिग्नल पर रुकने पर सामने खिलौने बेचनेवाले शख्सपर नजर पड़ी.मैले कुचले कपड़े,हाथ मे तीन चार हवाई जहाज लिए एक कार के दरवाजे में खड़ा,नजरमें एक रिक्वेस्ट '' लेलो भाई! एक खिलौना,इससे तुम्हारा बच्चा खेलेगा तो हमारे बच्चे हैं आज शाम दिवाली बनाएगा"कैसा ये भेद.
मैं सोचते सोंचते अपने मोहल्ले से घर की तरफ रुख करते.हमारे मोहल्ले में मस्जिद से कुछ ही दूरीपर फटाकडे के कई दुकान और बच्चे की दुकान पर भीड़ नजर आयी.कई बच्चे फटाकडे बजाते नजर आ रहे तो कई फटाकडे की आवाज से खुशियोसे उछल रहे थे.वो सब जातीके मुसलमान थे.आज दीपावाली का दिन एक बच्चा नए कपड़े दुकान में पूजा की जा रही है पहने है.एक का बाप मैले कुचले कपड़े पहने बच्चो केलिए खिलोने बेच रहा है.वो भी हवाई जहाज.ये नजारे ईद में भी दिखाई देता है.एक बच्चा फिरते झूले में झूलता है तो एक बच्चा भिक मांगता नजर आता है.विधानसभा चुनाव में इस बात पर कोई चर्चा कहाँ थी.चर्चा तो मंदिर मस्जिद पर,चर्चा तो हिन्दू मुस्लमान पर,चर्चा कहा होती है गरीबी पर,लगता है गुप्त चर्चा हो तो हो शायद गरीब हिन्दू हो या मुसलमानों के हटानेपर!....
सच तो यह भी है ना हमने भी तो वोट दिया है ना लोकसभा या विधानसभा मे जात के नाम पर!क्योकी हमने ईद दीपावालीपर सिग्नल के खिलौनेवाला /वाली को करीब आनेपर झिड़काया तो होंगा.कभी जाती जानने की कोशिश करते तो देश का कोई भी चुनाव धर्म के नाम पर ना लढ़ा जाता,ना कभी कामयाब होते धर्म के नाम पर जहर फैलानेवाले, ना कोई धर्म के नाम पर जीतकर सत्ता में आता. आज हमारे मुस्लिम मोहल्ले में भी फटाके बच्चे उड़ा रहे है.सोंचो अपने बच्चोके भविष्य केलिए आज दीपावाली के मौके पर.....
(अफजल सय्यद)



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