"क्यो के हमारे देश मे नकारा सोच ड्राइंग जैसे अहमियत वाले सब्जेक्ट की होने वजह से स्कूल एजुकेशन में कोई अहमियत नही है!"एक हकीकत....

"क्यो के हमारे देश मे नकारा सोच ड्राइंग जैसे अहमियत वाले सब्जेक्ट की होने वजह से स्कूल एजुकेशन में कोई अहमियत नही  है!"एक हकीकत....

    पड़ोस में रहने वाली आठ दस साल की वैष्णवी थोडी थोडी वक्त में आकर भाभी कहाँ है आकर पूछ रही थी.मेरी बीवी उसे एकही जवाब दे रही थी.थोड़ी देर में आएंगी.अब के वह कह पड़ी "फ़ोन करो जल्दी आने को कहो ना." हम सब उसकी बातों को सुन हंस पड़े.मेरी बीवी जब आती तब पूछती थी,क्या काम है? वह कहेती,"बस काम है." पर अब शायद वो अपने  दिली अंदरूनी जज्बात की रोक नही पायी थी.भाभी याने मेरी बहु,जिसका आने का रास्ता वैष्णवी देख रही थी.मेरा बेटा बाहर से आता देख उसे पूछ रही थी भाभी आयी क्या?वो उसपर चिल्लाया ,"चल भाग यहाँ से "कहता है घर के अंदर चला आया.कुछ देर पहले मेरी बहु घर आ गयी थी.वैष्णवी ने फिर वही आवाज लगाई. मेरी बीवी ने बहु से पूछा" क्या काम है वैष्णवी का? कितनी देर से बार बार आकर पूछे जा रही है."बहु ने कहा उसे कोई ड्राइंग निकालनी है."
     मैं फेसबुक देखा रहा था.आज तक न्यूज की राम मंदिर सुप्रीम फैसले के बाद वक्फ बोर्ड में फेरविचार याचिका दाखिल करने की बात कही.क्या ये सही है या गलत चर्चा चल रही  वो मैं देख रहा था.यहां न्यूज एंकर जज बने बैठा.सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ फेर याचिका कैसे गलत ये बतला रहा था.इससे अजीब तो एक मुस्लिम वक्ता जोर जोरसे कह रहा था.कोर्ट में जाना याने हिंदू मुस्लिम समाज मे टेढ़ पैदा करना है.कह कर घटना ने दिए अधिकार से रोक रहा था.ये डिबेट दो रोज पहले की थी.वैष्णवी बार बार हमारे घर आकर अधिकार पूर्ण तरीके से कह रही थी.भाभी को फोन कर जल्दी बुलाओ!क्यो के उसे भाभी से ड्राइंग निकाल लेनी थी.वैष्णवी को ड्राइंगनिकालनी आती नही थी.स्कूल में घर से ड्राइंग निकाल लाने की कहा गया था.न्यूज चैनेल पर हिंदू मुस्लिम नफरत फैलने की बात जोर शोर से कही जा रही थी.अच्छी बात ये थी के वैष्णवी और मेरी बहु  न्यूज चैनेल या सोशल मीडिया नही देखती थी.ऐसा ही कहना पड़ेंगा.हम दो अलग अलग मजहब के पड़ोसी बहोत सालोंसे है.जहाँ मुस्लिम समाज ९९फीसदी होने के बावजूद नफरत की सोच तक दोनों समाज नही है.लेकिन मीडिया.
     वैष्णवी ने ड्राइंग निकालने के लिए सफेद कागज बहु के हाथ थमा दिया.बहु ड्राइंग पिछले रूम में बैठकर निकाल रही थी.मैंने पीछे के रुम में जाकर देखा तो वैष्णवी बाजू में बैठी है और बहू फ्लॉवर पॉट पेंसिल से ड्रा कर रही थी.मैं ने वैष्णवी से कहा परीक्षा को भी पेपर के किए ले जा.मैं बाहर के रूम में आकर बीवी से कहा.क्या तुझे चित्र निकालना आता है.उसने मुस्कुराते हुए गर्दन हिलाकर हा के संकेत दिए.मैंने आसपास नजर दौड़ाई.शादी कार्ड दिखाई दिया.टेबल पर रखे हुए बॉल पेन पर नजर पड़ी.कार्ड और पेन लिए अपने बीवी से कहा मटके की फिगर निकाल कर देखा?उसने पेन से कार्ड पर मटके के साथ ग्लास की फिगर निकाली ग्लास का पता फिगर के देखने से पता नही चला बल्कि बीवी के कहने पर गौर से देखने पर समझ ने की कोशिश की.मैंने बीवीसे कहा बिना झकने का ग्लास कैसे रख दिया.वो फिर है हंस पड़ी.
    बाद बकेट उसने की तस्वीर अपने दिल से निकाल दिखाई. तो मैंने कहा भगोने की तस्वीर निकाल कर दिखाया.भगोना समझ ने ही नही आया.तब बीवी ने बहोत बेहत्तरीन बात कही.स्कूल में ड्राइंग का सब्जेक्ट तो है.मगर पास नापास के लिए उसकी कोई अहमियत नहीं है.इसलिए स्कूल में मार्क्स गिनती में नही होने के वजह से एक अच्छे सब्जेक्ट भी विद्यार्थीयों,पालको, शिक्षक और स्कूल में सब्जेक्ट होते हुए भी  गिनती में है ही नहीं. बीवी के बात बहोत पते की कही थी.
    ड्राइंग में मेरा स्कूल में अव्वल नंबर होता था.जब के गणित में हिसाब हिसाब के मार्क्स के लिया करता था.मेरा सोया हुआ चित्रकार जागा.मैंने पेन उठाये मटके की तस्वीर ड्रा करने लगा. मुझे कौवे कंकर वाली कहानी याद आयी.जब मैं कहानी को गौर करता हूं तो कहानी में मेरी नजरसे बे वजह कौवा कंकर डाले जा रहा था .कंकर के नीचे ही पाणी रह गया होंगा.कैसे पाणी ऊपर आया और कैसे प्यास बुझाया होंगा.के सवाल दिल मे पैदा हुए.गौर करे तो कंकर जमा करता करता ही प्यास से व्याकुल हो कर मर गया होंगा.इंसानी फितरत की बात करे तो मटके के पास कौवे को फिरकने ही नही देगा.लेकिन बचपन से आज तक कौवे की कहानी याद आयी तो प्यासा कौवा और मटका जहन में आ ही जाता है.मगर हम इसे कई सालोंसे एक दूसरे पीढ़ी दर पीढ़ी सुनते आ रहे और सुनाते जा रहे है. जब मेरे हाथोसे भरे हुए मटके पर कौवा इत्मिनान से पानी पी रहा है.ये तस्वीर  ड्रॉ खुद ब खुद हुई.सामाजिक भाव से देखा जाये तो पंछियों के पीने किए पाणी रखना.जो आज कल बहोत सी सामाजिक संघटना दिखाई देती है.हमारे शहर में इस गर्मी में बहोत सारी संघटनो बेहत्तरीन काम किये है.
     मेरे अपने सोंच को सकारात्मक बनाने में ड्राइंग सब्जेक्ट का बहोत बड़ा रोल रहा है.हम सब बे देखा है,छोटासा कार्टून बहोत बड़ा संदेसा देता है. हर बच्चा कार्टून बड़े चाव से देखता है.लेकिन कार्टून ड्रॉ कर ही नही सकता.क्यो के स्कूल ने ड्राइंग सिखाया जाता है.मार्क्स के गिनती में न होने की वजह से कीमत झिरो झिरो झिरो...क्यो के हमारे देश में नकारा सोंच की वजह से ड्राइंग जैसे बेहत्तरीन सब्जेक्ट की कोई भी अहमियत नही दर्जा नहीं.....जो बात मेरे बीवी के समझ मे आयी ,सरकार के कब समझ ने आएंगी.

                    (अफजल सय्यद,अहमदनगर)
                     E mail - bjsmindia@gmail. com

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