एक याद हसीन सी,बचपन आज याद आया!
एक याद हसीन सी,बचपन आज याद आया!
अम्मा पिछेसे चुपके चुपके आ रही थी.मेरे सब दोस्त अम्मा के इशारे से खामोश रहने की आर्डर से सबने खामोशी इख़्तियार कर ली थी.अम्माके से सामने मेरे दोस्तों की क्या मजाल के कोई मुझे इशारा भी करे के अम्मा आ रही है.पीछे से पत्थर जब बदन पर वार कर गया.तो गिल्ली दांडा जगह छोडकर मैं पीछे मुड़कर न देख, सीधा घर की तरफ हर बाधा को पारकर भाग जाता.घर पर पोहचने पर पता चलता के पैर में कांटा है.या कई पत्थर जख्म कर गया है.बचपनमें खेल खेलते समय कब किसे वक्त (टाइम )याद रहता है.अम्माको को खाना बनाते वक्त दुकान से कुछ शायद मंगवाना होंगा. इसलिए के आवाजे मेरे नाम से लगवाई होंगी.पर मुझे कहा आवाज सुनने आने वाली थी.मैं अपने दोस्तों के साथ मैदान में खेलने के लिए गया था.
अम्मासे मैंने घर के बाहर पेड के नीचे खेलने इजाजत मिन्नते कर लिया था.अम्माने इजाजत देते वक्त हिदायत दी थी के कही दूर न जाना पेड़ के साये में ही अपने बहन भाई को साथ लेकर खेलना.मैंने गर्दन हिलाकर अम्माकी को हामी भर दी थी.घर मे मैं बड़ा था.छोटे भाई को गोदमें उठाए बहनों को साथ लिए पेड़ के नीचे जाकर हम लंगड़ी खेलने लगे.थोड़ी ही देर में सायकल के टायर की चकारी खेलते पिछली गलीक़े दो दोस्त मुझको देख रुककर बात करने लगे.मैं भी लंगड़ी खेलता हुआ रुक गया.एक दोस्त ने कहा चल हम गिल्ली डंडा खेलते है.अम्मा के सिर्फ घर के करीब पेड़ के नीचे खेलने की इजाजत ही दी थी.मैंने अपने दोस्तों से गिल्ली डंडा खेलनेसे इन्कार किया.
वो अम्मा को अच्छी तरह जानते थे.इसलिए थोड़ी देर के लिए खामोश रहे.मेरे साथ लंगड़ी खेलने लगे थे.दूर से पिछली ही गलीसे एक लड़का उन दो लड़कों से इशारतन 'क्या हुआ?' इस अंदाज में कुछ कहने की कोशिश कर रहा था.मेरे साथ खेलने वाले एक दोस्तने कहा."चल ना गिल्ली डंडा खेलते है.चल यही नजदीक ही खेलेंगे."फिर दूसरा भी उसकी आवाज में आवाज मिलाने लगा.यह दोनों मेरी बिनती बार बार मेरे पास इसलिए कर रहे थे के,मेरे पास ही गिल्ली डंडा था.बहोत बिनती के बाद मैंने हा भर दी.दोनों दोस्त के चेहरे खिल उठे थे.दूर खड़े तीसरे से उसे इशारा कर बुला लिया.वह दौडता हुआ आया.उससे एक कहने लगा,यही करीब में खेलेंगे.उसने भी हामी भर दी.
मेरे सामने सवाल खड़ा हुआ गिल्ली डंडा घर में अम्माने कही छुपाकर रखा है.उसे ढूंढना और घर से बाहर लाना आसान नही था.मैं सोच रहा था.तो एक दोस्त कह पड़ा.चल ना,गिल्ली डंडा ले आ. मैंने आहिस्ता उस के कान में हकीकत ए गिल्ली डंडा बताया.ताके मेरी बहने ना सुन ले.कही वो सुन लेती है, तो अम्मा को जोरसे आवाज देकर शिकायत करने लगेगी.'भैया हमारे साथ नही खेल रहा.वो गिल्ली डंडा खेलने अपने दोस्तों के साथ जाने वाला है.'ये तो अच्छा था के उन्हें कुछ तो नजर आया था.इसलिए वो वहां देखने मे मगन थे.मौका पाते ही मैं हलके कदमोसे घर मे चला गया.चूल्हे पर गरमपानी भगोनेमे रखा हुआ था.शायद पाणी गरम होने तक अपने पीठ को पलंग पर टिकाए पड़ी थी,इसलिए आँख लग गयी होंगी.मेरे लिए रास्ता खुला मिल गया.
कहते है ना,"अंधा मांगे एक आंख,ऊपरवाला दे दो आंखे."अब गिल्ली डंडे को ढूंढना सुरु किया.हमारे पिचेले खोली में हमेशा अंधेरा रहता था.उन दिनों हमारे गाँव मे गिने चुने दो चार घर बिजली ही नही थी.पिछले घरमे बिना दिए के कुछ नजर ही नही आता था.क्या करे इस हालत में मैं सोच रहा था.बत्ती जलाए ,अम्मा उठ गई तो. मैंने अंधेरे खोली के अंदर बड़ी बहादुरी के साथ झाक देखा.दरवाजे के करीब ही गिल्ली डंडा नजर आया.मैं गिल्ली डंडा लेने के लिए हाथ बढ़ाया,बाहर से छोटे भाई की की रोने की आवाज आयी. मैं गिल्ली डंडा ले जोर से बाहर भागा.रोने की आवाज सुन अम्मा ने बाहर आकर मुझसे पूछा,"क्या हुवा?" मैंने जवाब दिया "कुछ नही." अब अम्मा घर मे चली गयी. मैंने अपने दोस्तों को गिल्ली डंडा देकर सामने ही खेलने का इशारा किया.
मैंने रोते हुए छोटे भाई को खामोश होने पर गिल्ली डंडा खेलने गया.खेल सुरु हुआ.मेरे एक दोस्त ने गिल्ली को जब डंडे से जोर से फटका मारा,सामने सायकल से आ रहे एक शख़्सके करीब से गिल्ली गुजरी.वो चिल्लाने लगा तो हम सब वहासे भाग गए.हमारे एक साथी के कहा.चलो मैदान में चले.कहकर मेरे तरफ नजर डाली.अब के मैं भी उनके साथ मैदान में चल पड़ा.हम सब खेलने में इतने मशगूल हो गए थे के वक्त का पता ही नही चला. शायद अम्मा को कोई काम मुझसे आया था.उसने घरमे से कई आवाज लगाई थी.लेकिन मेरी कोई आवाज जवाब में सुनाई नही दी.अब वो बाहर आयी तो मैं उसे कही नजर आया. उसने आसपास पूछा,भैया दिखा क्या?
हमारा पड़ोसी नदी से घर आते वक्त उसने मुझको मैदान में देखा था.मुझे देखते उसने मुझको कहा था,"धूप में क्या खेल रहे हो.चलो घर चलो."कहकर वो निकल पड़ा था. अम्माकी आवाज सुन उसने बताया था,"भैया मैदान में धूप में गिल्ली डंडा खेल रहा है.मैंने उसे घर साथ चलने को कहा था."कहकर घरमे वापस चला गया.अब अम्माकी सवारी मैदान की तरफ पूरे घुस्से के साथ बढ़ रही थी.मेरे हाथ मे गिल्ली गल ने लगाए कोलने के लिए तैयार था.सामने गिल्ली को झेलने को मेरे साथी तैयार थे.पीछे से अम्मा आ रही थी.पत्थर का टोला पीठ ने लगा.और भाग मिल्खा भाग घर पहोचने की बाद की कहानी आप सब समझ ही गये होंगे....... बचपन आज याद आया.
(अफजल सय्यद, अहमदनगर)
bjsmindia@gmail.com
अम्मा पिछेसे चुपके चुपके आ रही थी.मेरे सब दोस्त अम्मा के इशारे से खामोश रहने की आर्डर से सबने खामोशी इख़्तियार कर ली थी.अम्माके से सामने मेरे दोस्तों की क्या मजाल के कोई मुझे इशारा भी करे के अम्मा आ रही है.पीछे से पत्थर जब बदन पर वार कर गया.तो गिल्ली दांडा जगह छोडकर मैं पीछे मुड़कर न देख, सीधा घर की तरफ हर बाधा को पारकर भाग जाता.घर पर पोहचने पर पता चलता के पैर में कांटा है.या कई पत्थर जख्म कर गया है.बचपनमें खेल खेलते समय कब किसे वक्त (टाइम )याद रहता है.अम्माको को खाना बनाते वक्त दुकान से कुछ शायद मंगवाना होंगा. इसलिए के आवाजे मेरे नाम से लगवाई होंगी.पर मुझे कहा आवाज सुनने आने वाली थी.मैं अपने दोस्तों के साथ मैदान में खेलने के लिए गया था.
अम्मासे मैंने घर के बाहर पेड के नीचे खेलने इजाजत मिन्नते कर लिया था.अम्माने इजाजत देते वक्त हिदायत दी थी के कही दूर न जाना पेड़ के साये में ही अपने बहन भाई को साथ लेकर खेलना.मैंने गर्दन हिलाकर अम्माकी को हामी भर दी थी.घर मे मैं बड़ा था.छोटे भाई को गोदमें उठाए बहनों को साथ लिए पेड़ के नीचे जाकर हम लंगड़ी खेलने लगे.थोड़ी ही देर में सायकल के टायर की चकारी खेलते पिछली गलीक़े दो दोस्त मुझको देख रुककर बात करने लगे.मैं भी लंगड़ी खेलता हुआ रुक गया.एक दोस्त ने कहा चल हम गिल्ली डंडा खेलते है.अम्मा के सिर्फ घर के करीब पेड़ के नीचे खेलने की इजाजत ही दी थी.मैंने अपने दोस्तों से गिल्ली डंडा खेलनेसे इन्कार किया.
वो अम्मा को अच्छी तरह जानते थे.इसलिए थोड़ी देर के लिए खामोश रहे.मेरे साथ लंगड़ी खेलने लगे थे.दूर से पिछली ही गलीसे एक लड़का उन दो लड़कों से इशारतन 'क्या हुआ?' इस अंदाज में कुछ कहने की कोशिश कर रहा था.मेरे साथ खेलने वाले एक दोस्तने कहा."चल ना गिल्ली डंडा खेलते है.चल यही नजदीक ही खेलेंगे."फिर दूसरा भी उसकी आवाज में आवाज मिलाने लगा.यह दोनों मेरी बिनती बार बार मेरे पास इसलिए कर रहे थे के,मेरे पास ही गिल्ली डंडा था.बहोत बिनती के बाद मैंने हा भर दी.दोनों दोस्त के चेहरे खिल उठे थे.दूर खड़े तीसरे से उसे इशारा कर बुला लिया.वह दौडता हुआ आया.उससे एक कहने लगा,यही करीब में खेलेंगे.उसने भी हामी भर दी.
मेरे सामने सवाल खड़ा हुआ गिल्ली डंडा घर में अम्माने कही छुपाकर रखा है.उसे ढूंढना और घर से बाहर लाना आसान नही था.मैं सोच रहा था.तो एक दोस्त कह पड़ा.चल ना,गिल्ली डंडा ले आ. मैंने आहिस्ता उस के कान में हकीकत ए गिल्ली डंडा बताया.ताके मेरी बहने ना सुन ले.कही वो सुन लेती है, तो अम्मा को जोरसे आवाज देकर शिकायत करने लगेगी.'भैया हमारे साथ नही खेल रहा.वो गिल्ली डंडा खेलने अपने दोस्तों के साथ जाने वाला है.'ये तो अच्छा था के उन्हें कुछ तो नजर आया था.इसलिए वो वहां देखने मे मगन थे.मौका पाते ही मैं हलके कदमोसे घर मे चला गया.चूल्हे पर गरमपानी भगोनेमे रखा हुआ था.शायद पाणी गरम होने तक अपने पीठ को पलंग पर टिकाए पड़ी थी,इसलिए आँख लग गयी होंगी.मेरे लिए रास्ता खुला मिल गया.
कहते है ना,"अंधा मांगे एक आंख,ऊपरवाला दे दो आंखे."अब गिल्ली डंडे को ढूंढना सुरु किया.हमारे पिचेले खोली में हमेशा अंधेरा रहता था.उन दिनों हमारे गाँव मे गिने चुने दो चार घर बिजली ही नही थी.पिछले घरमे बिना दिए के कुछ नजर ही नही आता था.क्या करे इस हालत में मैं सोच रहा था.बत्ती जलाए ,अम्मा उठ गई तो. मैंने अंधेरे खोली के अंदर बड़ी बहादुरी के साथ झाक देखा.दरवाजे के करीब ही गिल्ली डंडा नजर आया.मैं गिल्ली डंडा लेने के लिए हाथ बढ़ाया,बाहर से छोटे भाई की की रोने की आवाज आयी. मैं गिल्ली डंडा ले जोर से बाहर भागा.रोने की आवाज सुन अम्मा ने बाहर आकर मुझसे पूछा,"क्या हुवा?" मैंने जवाब दिया "कुछ नही." अब अम्मा घर मे चली गयी. मैंने अपने दोस्तों को गिल्ली डंडा देकर सामने ही खेलने का इशारा किया.
मैंने रोते हुए छोटे भाई को खामोश होने पर गिल्ली डंडा खेलने गया.खेल सुरु हुआ.मेरे एक दोस्त ने गिल्ली को जब डंडे से जोर से फटका मारा,सामने सायकल से आ रहे एक शख़्सके करीब से गिल्ली गुजरी.वो चिल्लाने लगा तो हम सब वहासे भाग गए.हमारे एक साथी के कहा.चलो मैदान में चले.कहकर मेरे तरफ नजर डाली.अब के मैं भी उनके साथ मैदान में चल पड़ा.हम सब खेलने में इतने मशगूल हो गए थे के वक्त का पता ही नही चला. शायद अम्मा को कोई काम मुझसे आया था.उसने घरमे से कई आवाज लगाई थी.लेकिन मेरी कोई आवाज जवाब में सुनाई नही दी.अब वो बाहर आयी तो मैं उसे कही नजर आया. उसने आसपास पूछा,भैया दिखा क्या?
हमारा पड़ोसी नदी से घर आते वक्त उसने मुझको मैदान में देखा था.मुझे देखते उसने मुझको कहा था,"धूप में क्या खेल रहे हो.चलो घर चलो."कहकर वो निकल पड़ा था. अम्माकी आवाज सुन उसने बताया था,"भैया मैदान में धूप में गिल्ली डंडा खेल रहा है.मैंने उसे घर साथ चलने को कहा था."कहकर घरमे वापस चला गया.अब अम्माकी सवारी मैदान की तरफ पूरे घुस्से के साथ बढ़ रही थी.मेरे हाथ मे गिल्ली गल ने लगाए कोलने के लिए तैयार था.सामने गिल्ली को झेलने को मेरे साथी तैयार थे.पीछे से अम्मा आ रही थी.पत्थर का टोला पीठ ने लगा.और भाग मिल्खा भाग घर पहोचने की बाद की कहानी आप सब समझ ही गये होंगे....... बचपन आज याद आया.
(अफजल सय्यद, अहमदनगर)
bjsmindia@gmail.com



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