"अब समझ मे आया चींटियाँ हमे क्यो काटती है. शायद वो हमें हमारी औकात याद दिलाती है."



"अब समझ मे आया चींटियाँ हमे क्यो काटती है. शायद वो              हमें हमारी औकात याद दिलाती है."

     पिछले हफ्ते पंधरा दिन पहले की बात होंगी शायद अखबार में एक खबर छपी थी."बाप एकटाच स्मशानात जळत होता"बाप अकेला समशान ने जल रहा था. अखबार में दूसरी खबर ये भी थी,"माहेरी आलेल्या बहिनीस विहिरीत धकलून दिले."मायके आयी बहना की कुए में ढकेल दिया.आज जब मैंने अपने खीसे में जमे कुछ कागजात की चिठोरी निकाल पढ़ा रहा था.उसी में से एक चिठोरी पर मैंने नोट किया हुआ था.पिछले कई दिनोसे महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव  और चुनाव के बाद सरकार बनाने में मदारी का खेल.उसमे सुप्रीम कोर्ट का बाबरी पर फैसला,इनकी चर्चा ही पान  चाय के टापरी से लेकर हर जगह  आम रही.हम सब उसका हिस्सा बने हुए थे.
      आज सुबह जब मैं अपने शॉप पर आया.शटर का लॉक खोलने से पहले मुझको काले रंग की सूरज के उजाले से चमक रही गोम(एक बहुपैरवाला कीडा) चलती हुई नजर आयी.आम तौरपर किसीके घरमे गोम निकलते ही तो बच्चे के साथ बड़े भी चिल्ला पुकार करना सुरु कर देते है.झाड़ू लाओ, चप्पल लाओ कहते कहते जो हाथ मे आता उसी से मार देते है.कान में घुस जाती है,कई अवगुण गोम के बारे में बचपन से लेकर आज तक सुने है.पर आज तक किसीको नुकसान देते नही देखा ,लेकिन गोम दिखने के बात चंद मिनिटों में एक ही फटके में चटनी से होते कई बार देखा ही नही बल्कि घर वालोंके दबाव में किया जरूर है.
     आज मैं घर मे नही था.मतलब किसीका दबाव नहीं था.पर पास के सार्वजनिक नल पर कुछ महिलाएं बर्तन धो रही थी और बच्चे बैठे हुए थे.मेरे दिल के मुझको खामोश रहने की ऑर्डर दे डाली.वैसे भी आजकल मैं थोड़ा समझदार हुआ हुँ. ऐसा मुझको लगता है.हो सकता गलत फहमी हो सकती है.मेरे समझदार होने की बात से मेरी बीवी शायद इतेफाक नही करेंगी.ये हाल सिर्फ मेरा नही है.आप सब की बीवियाँ भी आपके समझदारी पर एतेबार करती ही नही होंगी.मैने खीसे से मोबाइल निकाल गोम की तस्वीर खींचना सुरु किया.आज गोम भी फ़ोटोशूट के लिए तैयार थी.अलग अलग अंदाज में अलग पोज दे रही थी.मुझे डर लग रहा था के पीछे से मेरी हरक़ातों के देखकर नल के पास का कोई बच्चा आ जाये.हमारे बच्चे की फितरत तो सब जानते है.वन शॉट ऑल क्लियर,नो मोर!
     गोम की तस्वीर निकालते वक्त पास एक चींटी जो बाजरे का एक दाना मुंह मे पकड़कर घसीटता हुआ ले जाती है नजर आयी.मैंने चींटी को अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर लिया. चींटी बाजरे का दाना घसीटती दीवार पर उल्टी होकर चढ़ रही थी.छोटी सी चींटी को भी ऊपरवाले ने दिमागी सोंच दी है और पैरों में जान दी है (अल्लाहो अकबर) .जिसके वजह से ऊपर चढ़ रही थी.जाना कहाँ वो ही जानती है.थोड़ी ऊपर दो चीटियां मिलकर एक दूसरे का साथ देते हुए अपना खाद ले चढ़ रहे थे. ये नजारा दिल को बहोत भा गया था.मैने इस नजारे को भी मोबाईल में कैद कर लिया.कुछ देर बाद एक चींटी.पीछे घूमकर नीचे चल पड़ी.मानो ऐसा महसूस हो रहा था के वो उसे मदत करने के लिए आयी थी. मदत कर वापस निकल पड़ी थी.इतनी सी चीटियों की मेहनत और एक दूसरे को साथ देने का जज्बा हम जो अपने अक्ल पर और ताकत पर नाज करनेवाले इंसान के लिए बड़ा सबक ही है.
    अक्सर हम सब देखते है के उनकी ताकत से परे कीडे को बहोत सारी चींटिया एक साथ खिंच ले जाते है.इतनी सी चींटी की जहेनियत और इंसानियत आज के दौर के इंसान से जिसमे मेरा भी शुमार है,हम सब से बहोत ऊंचे दरजात की दिखाई पड़ी. बाप समशान में अकेला जल रहा था. मरने से पहले वृद्धाश्रम से मरनेवाले के  बेटे को फोन पर बतलाया गया. आपके पिता का देहांत हुआ.उसने फोन रख दिया.फिर फोन लगाया तो,बेटे ने गुस्से भरे अंदाज में  कहा "दुबारा फोन मत लगाना"चार बेटे,दो बेटियों में से एक भी बेटा या बेटी अंतिम संस्कार के लिए नही पहोंचा.बूढ़े ने अंतिम ईच्छा जतलाई थी के" मरने के बाद मेरे आंखे खुली रखना.अंतिम संस्कार में अग्नि देने तक भी मेरे बच्चे पहुँच सकते है.मैं जानता नही मरने के बाद आँखे देख सकते है या नही , शायद मेरी खुली आँखे उन्हें देख ले." उस बाप के मानस पुत्र ने उसे अग्नि दी.
     दूसरी घटना में भाई ने अपने बहाना को कुए में  ढकेल दिया था. हम धर्म संस्कृति को ऊँचा बचाने में कितने गिर जाते है. इंसान ही इंसान की जान लेता है.लेकिन धर्म मजहब के बताए हुए रास्ते पर कहा चलता है. जब के धर्म और मजहब की किताबों को रट रट पढ़ता तो है पर समझता नही. सर पर धर्म मजहब की किताबे  उठा लेता,मूर्तियां उठा लेता है.अपने माँ बाप से रिस्तेनातो को तोड़ देता है.भाई बहन से दूर होता है.भाई भाई से जुदा होता है यहाँ तक इंसान इंसान को रिश्ते नाते  भूल जानसे मार देता है. तब कहाँ किसे किसीका मजहब याद रहता है. अब समझ मे आया चींटियाँ हमे क्यो काटती है. शायद वो हमें हमारी औकात याद दिलाती है.देख मेरी हस्ती कितनी सी,जरासा काट लेती हूं तुझको तो कई देर तक दर्द से पैर मसलता है तू.जब के जुबान नही दी हमको खुदा ने.तू तो हाथ से मार पिट करता है, बे वजह जान भी लेता है. जुबान दी रबने तुझको तो, उसमे भी गलत इस्तेमाल  कर लोगोंको दिल भी दुखा देता है. आज इतनी सी चींटी बहोत बडासबक मुझको सीखा गयी. शुक्र है रब तेरा...

                             (अफजल सय्यद,अहमदनगर)
                              bjsmindia@gmail. com

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